डेटा और न्याय: भारत की अदालतों और एआई उपकरणों पर सवाल

न्यायपालिका को डिजिटलीकृत करने की लंबे समय से चल रही कोशिशों के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पीठ से दो नई पहलों की घोषणा की. ‘वन केस, वन डेटा’ (ओसीओडी), जो एकीकृत न्यायिक आँकड़ा मंच है, और ‘सु-सहायक’, जो भारत के उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता संचालित संवाद सहायक है. ओसीओडी का उद्देश्य किसी विवाद के विभिन्न अदालतों में आगे बढ़ने के दौरान उसका एकीकृत डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना है. इसके तहत अदालत के रिकॉर्ड और वादकारियों की कार्रवाइयों, जैसे अपील, के बीच जोड़ स्थापित होगा, विभिन्न दस्तावेज़ों तक आसान पहुँच मिलेगी, मैनुअल सत्यापन की आवश्यकता कम होगी, उच्च न्यायालयों और अन्य अदालतों के बीच पारस्परिक पहुँच संभव होगी, और न्यायिक आँकड़े अधिक सटीक बन सकेंगे.

यह पहल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत की हज़ारों जिला और अधीनस्थ अदालतों में सॉफ़्टवेयर प्रक्रियाओं और रिकॉर्ड की गुणवत्ता में भारी भिन्नता है. यदि यह कार्यक्रम सफल होता है, तो मानकीकृत आँकड़ों की मदद से प्रशासन यह पहचान सकेगा कि मुकदमे कहाँ अटक रहे हैं, प्रक्रियागत बाधाओं को कम किया जा सकेगा, और आँकड़ों पर आधारित निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होगी. ‘सु-सहायक’ को उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट के अग्रभाग से जोड़ा गया है ताकि उपयोगकर्ताओं को मुकदमों की स्थिति, कारण सूची, आदेश और निर्णय, ई-सेवाओं तथा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों तक पहुँचने में मदद मिल सके.

हालाँकि, भारत में किसी भी बड़े सरकारी तकनीकी कार्यक्रम की तरह यहाँ भी पारस्परिक समन्वय, पुराने रिकॉर्ड की विश्वसनीयता, निजी जानकारी की सुरक्षा और कर्मचारियों के प्रशिक्षण जैसे सवाल बने हुए हैं. प्रत्येक मामले के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल पहचान तैयार करने की महत्वाकांक्षा के कारण ओसीओडी के दुरुपयोग की आशंका भी मौजूद है.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ये नए उपकरण “न्याय तक पहुँच” को आसान बनाएँगे, लेकिन इनके लागू होने से डिजिटल विभाजन और गहरा हो सकता है. ओसीओडी के कारण वकीलों को डिजिटल स्कैनर, क्लाउड बैकअप और अद्यतन सॉफ़्टवेयर बनाए रखने की आवश्यकता पड़ सकती है. महानगरों की बड़ी कॉरपोरेट विधि फ़र्में इन खर्चों को आसानी से वहन कर लेंगी, लेकिन ज़िला और तहसील स्तर के स्वतंत्र वकीलों के लिए यह आर्थिक बोझ होगा. यह व्यवस्था उन वादकारियों के लिए डिजिटल बिचौलियों की नई परत भी पैदा कर सकती है जो ई-फाइलिंग पोर्टल का उपयोग नहीं कर पाते, जिससे अनियमित खर्च बढ़ने की आशंका है.

हालाँकि सरकार ने ‘जन सहायक’ जैसे आवाज़ आधारित सहायक विकसित किए हैं, लेकिन ‘सु-सहायक’ मुख्यतः लिखित पाठ आधारित है. इससे वे लोग बाहर छूट सकते हैं जो टाइप करने या जटिल वेबसाइट मेनू समझने में सहज नहीं हैं. सरकार और न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल हाशिये पर रहने वाले समुदायों के प्रति पक्षपाती न हो, क्योंकि इतिहास में इन्हीं समुदायों के लोगों को अनुपातहीन रूप से अधिक गिरफ़्तार किया गया है या ज़मानत से वंचित रखा गया है.

भारत की अदालतें अब तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मुख्यतः सहायक उपकरण के रूप में अपनाने में अधिक सहज रही हैं, न कि न्यायिक तर्क के आधार के रूप में. ‘सु-सहायक’ से पहले ‘सुवास’ का उपयोग निर्णयों के अनुवाद के लिए और ‘सुपेस’ का उपयोग तथ्यों तथा कानूनी उदाहरणों के विश्लेषण के लिए किया जा चुका है. जैसे-जैसे न्यायपालिका अधिक शक्तिशाली तकनीकों को अपनाएगी, यह सीमा बनाए रखना आवश्यक होगा, क्योंकि अन्य क्षेत्रों में ऐसे उपकरणों के दुरुपयोग के उदाहरण पहले ही सामने आ चुके हैं.

यह ‘द हिन्दू’ में छपी अंग्रेजी लेख का हिंदी रूपांतरण है. मूल लेख यहाँ पढ़ी जा सकती है.

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