भंवर मेघवंशी | राजनीति में जो गाय जिंदा है,वह जमीन पर मर रही है!
देश में गाय इन दिनों सबसे ज्यादा राजनीति में जीवित है और सबसे ज्यादा जमीन पर मर रही है.जैसलमेर की वे तस्वीरें किसी सभ्य समाज के चेहरे पर कालिख की तरह चिपक जानी चाहिए थीं,जिनमें एक किलोमीटर तक सड़ी हुई गायों के शव बिखरे पड़े हैं. पांच सौ से ज्यादा गायें मर गईं.गर्मी,भूख,प्यास, लापरवाही और सिस्टम की संवेदनहीनता ने उन्हें मार डाला,लेकिन यह देश अजीब है.यहां गाय की लाश पर राजनीति होती है,गाय के जीवन पर नहीं.
जिन लोगों ने वर्षों तक ‘गौ माता’ के नाम पर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ीं,वही लोग आज इन सड़ती हुई गायों पर खामोश हैं.कभी गोहत्या के नाम पर लोगों को पीट पीट कर मार दिया गया.कभी किसी मुस्लिम,दलित,घुमंतू या पशुपालक को ‘गौ तस्कर’ बताकर मॉब लिंचिंग कर दी गई.कभी ट्रकों को रोका गया,कभी डेयरी वालों को धमकाया गया,कभी चमड़ा मजदूरों को अपमानित किया गया.
गाय बचाने के नाम पर इंसान मारे गए और अब गायें खुद मर रही हैं.पूछिए उन तथाकथित गौरक्षकों से कि अब वे कहां हैं?
किस गौशाला में हैं? किस रेगिस्तान में पानी पिला रहे हैं? किस डंपिंग यार्ड में सड़ती गायों को कंधा दे रहे हैं? दरअसल यह धार्मिक आस्था नहीं,राजनीतिक कारोबार है.अगर गाय सचमुच आस्था का विषय होती तो देश में पशु चिकित्सा व्यवस्था मजबूत होती.चरागाह बचाए जाते.पशुपालकों को सहयोग मिलता.
आवारा पशुओं के लिए वैज्ञानिक नीति बनती.लेकिन यहां गाय को जीवित प्राणी नहीं,चुनावी प्रतीक बना दिया गया.जिस देश में किसान अपनी बूढ़ी गाय छोड़ने को मजबूर हो जाए,जहां पशुपालक चारे और पानी के लिए तरस जाएं,जहां हजारों गोवंश कूड़े में मरें.वहां गौ रक्षा का शोर एक क्रूर मजाक लगता है.
पश्चिम बंगाल में बकरीद के लिए पशु खरीद पर रोक लगाने की राजनीति हो या उत्तर भारत में गौरक्षा के नाम पर हिंसा,असल मकसद धार्मिक ध्रुवीकरण है.गाय अब पशु नहीं रही,राजनीतिक हथियार बना दी गई है.उसके नाम पर समाज को बांटो,भीड़ को भड़काओ,नफरत पैदा करो और चुनाव जीत लो.यह वही राजनीति है जिसमें गाय की रक्षा कम,सत्ता की रक्षा ज्यादा होती है.गौरक्षक या सड़कछाप गिरोह?
देश ने पिछले वर्षों में देखा है कि कैसे स्वयंभू गौरक्षक कानून से ऊपर खड़े हो गए.वे गाड़ियां रोकते हैं,पहचान पूछते हैं,मारपीट करते हैं,वीडियो बनाते हैं, जयकारे लगाते हैं.भीड़ अदालत बन जाती है.शक सबूत बन जाता है और हत्या राष्ट्रभक्ति घोषित कर दी जाती है.
यह कानून का राज नहीं,भीड़ का जंगलराज है.सबसे बड़ा पाखंड यही है,जो लोग गाय के नाम पर इंसानों की हत्या को जायज ठहराते हैं,वे ही हजारों गायों की मौत पर चुप रहते हैं.जैसलमेर की तस्वीरें पूछ रही हैं कि क्या गाय केवल नारे में पवित्र है? क्या उसकी कीमत सिर्फ तब तक है,जब तक उससे राजनीति हो सकती है?अगर सचमुच गाय माता है,तो उसका यह अपमान किस श्रेणी में आएगा?
भारत का संविधान कानून के शासन की बात करता है,लेकिन गौरक्षा की राजनीति ने कई जगह कानून को भीड़ के हवाले कर दिया.आज जरूरत इस बात की है कि मॉब लिंचिंग पर कठोर कानून बने.स्वयंभू गौरक्षक गिरोहों पर कार्रवाई हो.पशुपालकों को सुरक्षा मिले.गोशालाओं और पशु संरक्षण का वैज्ञानिक ढांचा विकसित हो और सबसे जरूरी बात यह है कि धर्म के नाम पर हिंसा की राजनीति बंद हो.
गाय को बचाना है तो पहले इंसानियत बचानी होगी.नफरत से न गाय बचेगी,न समाज.जिस देश में गाय के नाम पर आदमी मार दिया जाए और गाय खुद कूड़े में सड़ती मिले,वहां समस्या धर्म की नहीं,राजनीति की है.सच यह है कि गाय आज राजनीति में पूजी जा रही है और जमीन पर मर रही है.
भंवर मेघवंशी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

