रथिन रॉय | जेन ज़ी सबसे बड़ी समस्या आर्थिक है और ये उनको एक साथ ला रहा है

‘हरकारा डीप डाइव’ में निधीश त्यागी ने अर्थशास्त्री रथिन रॉय के साथ देश के युवाओं, खासकर जेन ज़ी के बढ़ते असंतोष, बेरोजगारी, परीक्षाओं की विश्वसनीयता और आर्थिक भविष्य पर बातचीत की. जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन और उसके बाद की घटनाओं के संदर्भ में सवाल यह था कि जिस पीढ़ी को कभी भारत का "डेमोग्राफिक डिविडेंड" कहा गया था, वही आज अपने भविष्य को लेकर सड़कों पर क्यों है.

रथिन रॉय के मुताबिक जेन ज़ी का संकट पिछली पीढ़ियों से अलग है. जेनरेशन एक्स और मिलेनियल्स के एक बड़े हिस्से ने वह दौर देखा, जब आर्थिक उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र में अवसर और आमदनी बढ़ी. कार, घर और एयर कंडीशनर जैसी चीजें तनख्वाह के मुकाबले अधिक सुलभ होती गईं. लेकिन 2008-09 के बाद यह तस्वीर बदलने लगी. आज नौकरियां कम हैं और जहां हैं, वहां आमदनी ऐसी नहीं कि युवा अपने लिए स्थिर आर्थिक भविष्य बना सके.

रॉय का तर्क है कि जेन ज़ी की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक है और यही अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के युवाओं को साझा असंतोष से जोड़ रही है. अच्छी पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं को भविष्य का रास्ता मानने वाले युवाओं के सामने पेपर लीक जैसी घटनाओं ने इस रास्ते की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा कर दिया है. यानी नौकरी की गारंटी नहीं है और नौकरी तक पहुंचने वाली परीक्षा की निष्पक्षता पर भी भरोसा कमजोर हुआ है.

बातचीत में रॉय ने विरासत की राजनीति और अवसरों की असमानता को भी इस संकट से जोड़ा. उनके मुताबिक जिन युवाओं के पास पारिवारिक संपत्ति, आर्थिक सुरक्षा या राजनीतिक-सामाजिक संपर्क नहीं हैं, उनके लिए आगे बढ़ने के रास्ते लगातार मुश्किल होते जा रहे हैं. ऐसे में सिर्फ सब्सिडी या लाभार्थी योजनाएं युवाओं को भविष्य का भरोसा नहीं दे सकतीं.

रॉय इसके समाधान के लिए "जहां घर, वहीं नौकरी" की अवधारणा रखते हैं. उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश-बिहार जैसे राज्यों के युवाओं को रोजगार के लिए हजारों किलोमीटर पलायन करने के बजाय अपने आसपास काम मिलना चाहिए. कृषि को लाभकारी बनाने, कपड़ा उत्पादन, बड़े पैमाने पर आवास निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य और नर्सिंग जैसे क्षेत्रों में रोजगार पैदा करने की जरूरत है.

उनका केंद्रीय तर्क है कि सिर्फ जीडीपी की वृद्धि पर्याप्त नहीं है. आर्थिक वृद्धि से नौकरियां पैदा हों, नौकरियों से आमदनी बढ़े और बढ़ी हुई आमदनी से लोगों की क्रय क्षमता और समृद्धि बढ़े, तभी विकास "समावेशी वृद्धि" में बदल सकता है. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

Previous
Previous

जनाक्रोश का मनोविज्ञान: सरकार ने सीजेपी आंदोलन को समझने में भारी भूल की : आशीष नंदी

Next
Next

कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध के बाद: सरकारों और संस्थानों की अगली परीक्षा