बिहार से बंगाल तक: कैसे गढ़े गए चुनावी नैरेटिव
बिहार और पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति में कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं. बिहार में 2025 के चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 243 में से 202 सीटें जीत लीं, जबकि पश्चिम बंगाल में 2026 के चुनाव में भाजपा 77 से बढ़कर 207 सीटों तक पहुंच गई. दूसरी तरफ राजद और तृणमूल कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियां बुरी तरह सिमट गईं. इन नतीजों ने विपक्षी दलों के साथ-साथ राजनीतिक पर्यवेक्षकों को भी चौंका दिया.
भाजपा समर्थक इन जीतों को सत्ता विरोधी माहौल, खराब प्रशासन और विपक्ष की कमजोरी का परिणाम बता रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या बिहार में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली एनडीए सरकार के खिलाफ कोई नाराजगी नहीं थी. क्या सिर्फ पांच साल में ऐसा बड़ा बदलाव हुआ कि भाजपा-जदयू गठबंधन 122 से सीधे 202 सीटों तक पहुंच गया.
दो राज्य और दो तरीके
भाजपा अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रणनीतियों के जरिए समान राजनीतिक परिणाम हासिल करती है. बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर कई अनियमितताओं की चर्चा हुई. सीमांचल क्षेत्र में “घुसपैठियों” का मुद्दा उठाकर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को हवा दी गई. हालांकि एसआईआर के आंकड़ों में ऐसे घुसपैठियों का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला, लेकिन यह नैरेटिव चुनावी माहौल बनाने में सफल रहा.
इसके अलावा चुनाव से पहले करोड़ों महिलाओं के खातों में नकद राशि ट्रांसफर की गई. प्रवासी मजदूरों को त्योहारों के दौरान घर लाने और आर्थिक सहायता देने जैसी योजनाओं ने भी चुनावी असर डाला. विपक्ष ने इसे मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश बताया, लेकिन चुनाव आयोग ने इसमें कोई गड़बड़ी नहीं मानी.
पश्चिम बंगाल में भाजपा के पास बिहार जैसी सरकारी मशीनरी का सीधा नियंत्रण नहीं था. इसलिए वहां मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे. आरोप लगे कि लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए और नए नाम जोड़े गए. विपक्ष का दावा था कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही और इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुए.
लेख यह भी बताता है कि भाजपा केवल चुनाव नहीं जीतती, बल्कि जीत के बाद नैरेटिव भी बदल देती है. बिहार में “जंगल राज” और “वंशवाद” के खिलाफ अभियान चलाया गया, लेकिन बाद में उन्हीं नेताओं को “कानून व्यवस्था सुधारने वाला” चेहरा बनाकर पेश किया गया जिन पर पहले गंभीर आरोप लग चुके थे. बंगाल में भी भाजपा ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और कुप्रशासन का नैरेटिव मजबूत करने में लगी हुई है.
विपक्ष की रणनीति में दरारें
लेखक के अनुसार विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी वैचाकरण और रिक अस्पष्टता और कमजोर प्रतिरोध है. बंगाल में भाजपा नेताओं ने खुले तौर पर सांप्रदायिक बयान दिए, लेकिन विपक्ष उस नैरेटिव का प्रभावी जवाब नहीं दे पाया. इससे हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीमजबूत हुआ.
इसी तरह बिहार में जदयू ने सीएए जैसे मुद्दों पर भाजपा का साथ दिया. इससे हिंदुत्व राजनीति को और वैधता मिली. लेखक का मानना है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की चुप्पी और कई मुद्दों पर उनका रणनीतिक समझौता भाजपा को अपने नैरेटिव को सामान्य बनाने में मदद करता रहा है.
भारतीय लोकतंत्र में अब चुनाव केवल वोटों का खेल नहीं रह गया है. नैरेटिव, संस्थाओं पर नियंत्रण, मीडिया की भूमिका और प्रशासनिक प्रभाव चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं. अगर विपक्ष इन चुनौतियों का वैचारिक और संगठनात्मक जवाब नहीं देता, तो आने वाले समय में उसके सामने और बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.
‘द वायर’ में नलिन वर्मा की रिपोर्ट है. वे पत्रकार, लेखक और शिक्षाविद हैं. विस्तृत रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.

