वंदे मातरम पर बहस: गीत, इतिहास और राष्ट्रवाद का सवाल | #harkara
‘कड़वी कॉफी’ की इस कड़ी में प्रो. अपूर्वानंद और शुद्धव्रत सेनगुप्ता के साथ वंदे मातरम को लेकर जारी विवाद पर विस्तार से बातचीत. क्या वंदे मातरम के पूरे छंद गाना अनिवार्य होना चाहिए? इस गीत का मूल साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ क्या है? आनंदमठ में इसका अर्थ कैसे बदलता है? और क्या किसी नागरिक को देशभक्ति की एक तय अभिव्यक्ति के लिए बाध्य किया जा सकता है? बातचीत में शुद्धव्रत सेनगुप्ता वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों और बाद के छंदों के बीच के अंतर, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक प्रतीकों, तथा ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसी परंपराओं की आपत्तियों पर चर्चा करते हैं. साथ ही आनंदमठ के मुसलमान विरोधी संदर्भ, संन्यासी-फकीर विद्रोह के इतिहास और 1937 में कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के निर्णय को भी समझने की कोशिश की जाती है. रविंद्रनाथ टैगोर की रचनाओं, राष्ट्रवाद और हिंदू जातीयतावाद पर उनकी आलोचनात्मक दृष्टि के साथ बातचीत नागरिक स्वतंत्रता के सवाल तक पहुंचती है. बीजू इमैनुएल मामले का उदाहरण देते हुए यह सवाल उठाया जाता है कि यदि कोई नागरिक शांतिपूर्वक रहे और किसी राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान में बाधा न डाले, तो क्या उसे गाने के लिए बाध्य किया जा सकता है? “आप मुझे किसी से प्रेम करने के लिए बाध्य कैसे कर सकते हैं?” क्या देशभक्ति की अभिव्यक्ति का तरीका भी राज्य तय करेगा? वंदे मातरम पर जारी बहस के बहाने इतिहास, धर्म, राष्ट्रवाद और नागरिक स्वतंत्रता के इन सवालों को समझने के लिए पूरी बातचीत सुनिए. #कड़वीकॉफी #वंदेमातरम #राष्ट्रवाद #नागरिकस्वतंत्रता #आनंदमठ #इतिहास #अपूर्वानंद #शुद्धव्रतसेनगुप्ता #Harkara

