राम मंदिर विवाद के बाद क्या टूट रहा है भक्तों का भरोसा? रीबॉर्न मनीष #harkara

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने डिजिटल क्रिएटर और राजनीतिक टिप्पणीकार रीबोर्न मनीष के साथ राम मंदिर में चढ़ावे में कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत केवल एक वित्तीय विवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस सवाल तक पहुंची कि क्या तीन दशकों से आस्था और राजनीति के नाम पर तैयार की गई सामाजिक चेतना अब अपने सबसे कठिन मोड़ पर खड़ी है. रिबॉर्न मनीष का कहना है कि 1990 के दशक के बाद एक पूरी पीढ़ी ने हिंदुत्व की राजनीति को केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया. उनके अनुसार सोशल मीडिया, व्हाट्सएप और लगातार चलने वाले वैचारिक प्रचार ने इस सोच को और मजबूत किया. उन्होंने कहा कि समय के साथ बहुत से लोगों ने इतिहास और समाज को समझने की स्वतंत्र कोशिश छोड़ दी और उन्हें जो जानकारी मिलती रही, उसी को अंतिम सत्य मानते गए. यही कारण है कि आज जब राम मंदिर से जुड़े कथित वित्तीय विवाद सामने आए हैं, तब सबसे अधिक मानसिक संकट उन्हीं लोगों के सामने खड़ा हुआ है जिन्होंने इस आंदोलन को अपने जीवन का भावनात्मक निवेश माना था. रिबॉर्न मनीष ने कहा कि यह केवल किसी आर्थिक गड़बड़ी का मामला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के विश्वास के टूटने का क्षण है. उनके अनुसार अर्थव्यवस्था, विदेश नीति या दूसरे सरकारी फैसलों पर सवाल उठने पर समर्थक अक्सर दूसरे मुद्दों का सहारा लेकर बहस को मोड़ देते थे, लेकिन मंदिर से जुड़े आरोपों में ऐसा करना आसान नहीं है. उनका कहना था कि यहां न विपक्ष को दोष दिया जा सकता है, न पाकिस्तान या किसी दूसरे देश को, क्योंकि सवाल उसी व्यवस्था के भीतर से उठ रहे हैं जिसने स्वयं इस पूरे आंदोलन का नेतृत्व किया था. चर्चा के दौरान रिबॉर्न मनीष ने कहा कि पिछले तीन दशकों में राम मंदिर आंदोलन केवल धार्मिक अभियान नहीं रहा, बल्कि एक बड़े राजनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में विकसित हुआ. उनके मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया में आस्था को राजनीतिक पूंजी में बदला गया और अब जब पारदर्शिता तथा जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं, तब समर्थकों के सामने अपनी पुरानी धारणाओं की समीक्षा करने की चुनौती खड़ी हो गई है. उन्होंने कहा कि किसी भी विचारधारा से जुड़ना गलत नहीं होता, लेकिन उसे अपनी स्थायी पहचान बना लेना व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी मुश्किल पैदा करता है. रीबोर्न मनीष ने यह भी कहा कि लोकतंत्र केवल निष्ठा से नहीं चलता, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता से चलता है. उनके अनुसार यदि किसी धार्मिक ट्रस्ट या सार्वजनिक संस्था पर सवाल उठते हैं तो निष्पक्ष जांच और स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए. उनका मानना है कि संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बच सकती है जब कानून का व्यवहार सभी के लिए समान हो और किसी भी मामले में राजनीतिक सुविधा के आधार पर अलग-अलग मापदंड न अपनाए जाएं.

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