परकला प्रभाकर: ‘हर राजनीतिक दल का भाजपाकरण हो जाएगा’
वर्ष 2026 भारत के राजनीतिक इतिहास में पाँच राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी—के हाई-प्रोफाइल विधानसभा चुनावों के लिए दर्ज हो चुका है. लेकिन इन चुनावों के पीछे की प्रक्रिया और 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक और एसआईआर के प्रखर आलोचक परकला प्रभाकर का मानना है कि ये चुनाव केवल हार-जीत का आंकड़ा नहीं हैं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे में बदलाव का संकेत हैं.
‘रेडिफ’ की शोभा वारियर के साथ दो भागों वाले इस विशेष साक्षात्कार के पहले भाग में प्रभाकर कहते हैं, "इस एसआईआर के अंत में, भारत में दो श्रेणियों के लोग होंगे. एक वर्ग जिसके पास वोट होगा और दूसरा वर्ग जिसके पास वोट नहीं होगा. इसका मतलब है कि भारत में दो तरह के लोग होंगे—एक वे जिनके पास राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने के अधिकार सहित पूर्ण अधिकार होंगे, और दूसरे वे जिनके पास आंशिक अधिकार होंगे." हम यहां उनके हिंदी में अनुदित इंटरव्यू का सारांश दे रहे हैं.
उन्होंने कहा, "कल्पना कीजिए एक ऐसी बस्ती की जहाँ लगभग 500 लोग रहते हैं, लेकिन उनमें से किसी के पास वोट नहीं है. क्या कोई राजनीतिक दल वहाँ जाएगा? क्या उन्हें पानी, राशन, सड़क, स्कूल या अस्पताल दिया जाएगा? कुछ भी नहीं."
प्रभाकर कहते हैं, "बंगाल में एसआईआर को जिस तरह से लागू किया गया, उसे देखिए. वे अपनी सुविधा और जीत के अनुसार मतदाता सूची को पूरी तरह से तैयार करना चाहते थे."
"चुनिंदा तरीके से हटाए गए नामों और लक्षित मतदाता सूची को देखिए."
"टीएमसी और भाजपा के बीच अंतर केवल 4% के करीब था, लेकिन वह 4% वोट इतनी चयनात्मकता के साथ डाला गया कि अंततः यह अंतर 100 सीटों के रूप में सामने आया!" यह 'तार्किक विसंगति' चुनावी निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है.
वर्ष 2026 को पांच राज्यों के जबरदस्त विधानसभा चुनावों के लिए याद किया जाएगा. लेकिन इतिहास हमें इन चुनावों के बारे में क्या बताएगा? प्रभाकर अपनी उस भविष्यवाणी का उल्लेख करते हैं जो उन्होंने चुनाव से पहले की थी. उनका तर्क था कि भाजपा का मुख्य लक्ष्य ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन जैसे कद्दावर क्षेत्रीय नेताओं को कमजोर करना था. परिणामों को देखें तो भाजपा इन लक्ष्यों में काफी हद तक सफल रही.
केरल के संदर्भ में प्रभाकर एक दिलचस्प पहलू उजागर करते हैं. उनके अनुसार, भाजपा के पास दो विकल्प थे: या तो वामपंथियों को हराकर भारत को 'वाम-मुक्त' घोषित करना, या कांग्रेस का मनोबल तोड़ना. उन्होंने संभवतः दूसरे विकल्प को चुना, ताकि भविष्य में कांग्रेस की आलोचनात्मक शक्ति को कुंद किया जा सके. वे कहते हैं, "इंडिया गठबंधन में स्टालिन और ममता ही वे नेता थे, जो संघवाद और वित्त हस्तांतरण जैसे मुद्दों पर भाजपा के खिलाफ मजबूती से खड़े थे."
प्रभाकर ने पश्चिम बंगाल के चुनावों को 'एक राज्य पर आक्रमण' की संज्ञा दी. वे आंकड़ों के जरिए बताते हैं कि जहाँ 2024 के आम चुनाव में पूरे देश के लिए एक लाख केंद्रीय बल तैनात थे, वहीं अकेले बंगाल के विधानसभा चुनाव में 2.88 लाख बल झोंक दिए गए. पुलिस स्टेशनों से लेकर जिला प्रशासन तक का नियंत्रण केंद्रीय बलों के हाथ में था.
साक्षात्कार का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा मतदाता सूची से नामों के विलोपन का है. प्रभाकर के अनुसार, बंगाल में कुल 93 लाख नाम हटाए गए. वे स्पष्ट करते हैं कि इनमें से 28 लाख लोग ऐसे थे जिन्हें आधिकारिक तौर पर 'अपात्र' घोषित नहीं किया गया था, फिर भी वे वोट नहीं दे सके.
वे तर्क देते हैं, "अगर आप किसी को अपात्र घोषित नहीं करते, तो उसे वोट देने से कैसे रोक सकते हैं? मेरी नज़र में, यदि एक भी पात्र नागरिक को उसके अधिकार से वंचित किया गया है, तो वह चुनाव 'वैध' नहीं कहला सकता." उनका यह विरोध किसी दल विशेष की जीत के खिलाफ नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया के हनन के खिलाफ है.
प्रभाकर चेतावनी देते हैं कि एसआईआर के परिणाम केवल चुनावी हार-जीत तक सीमित नहीं रहेंगे. इसके माध्यम से भारत में नागरिकों की दो श्रेणियां बनाई जा रही हैं.
इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम परिणाम प्रभाकर की नज़र में "राजनीति का भाजपाकरण" है. उनका मानना है कि जब एक बड़ा वर्ग चुनावी व्यवस्था से बाहर हो जाएगा, तो हर राजनीतिक दल केवल उसी वर्ग को संबोधित करेगा जिसके पास वोट है.
वे कहते हैं, "धीरे-धीरे धार्मिक प्रतीक राजकीय प्रतीक बनने लगेंगे. जो भी उस धर्म या संस्कृति का हिस्सा नहीं है, वह व्यवस्था से बाहर होगा. अंततः, अन्य दल भी टिके रहने के लिए भाजपा की ही भाषा और विचारधारा अपनाने लगेंगे." प्रभाकर का यह विश्लेषण संकेत देता है कि भारत एक ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है जहाँ सत्ता तो बदल सकती है, लेकिन विचारधारा का एकाधिकार बना रहेगा.
संक्षेप में परकला प्रभाकर का यह साक्षात्कार लोकतंत्र के भीतर पनप रही गहरी संरचनात्मक खामियों की ओर इशारा करता है. मतदाता सूची के प्रबंधन और नागरिकों के वर्गीकरण की यह प्रक्रिया भविष्य के भारत की सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है.

