बंगाल चुनाव में वोटर लिस्ट विवाद और मुसलमानों की भागीदारी पर उठते सवाल
पश्चिम बंगाल चुनाव के माहौल और एग्जिट पोल बताते हैं कि ममता बनर्जी और टीएमसी के सामने इस बार कड़ी चुनौती है, जबकि भारतीय जनता पार्टी के लिए अवसर बन सकता है. हालांकि, बंगाल में एग्जिट पोल के बार-बार गलत साबित होने का इतिहास भी है. इसके साथ ही हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ पश्चिम बंगाल चुनाव, मतदाता सूची, और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर गहन चर्चा की.
चर्चा का केंद्र चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर है. आरोप यह है कि इस बार चुनाव सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं था, बल्कि इसमें केंद्रीय सुरक्षा बलों, चुनाव आयोग और प्रशासनिक मशीनरी की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही. खासतौर पर यह कहा गया कि चुनाव के दौरान ध्रुवीकरण की राजनीति कई स्तरों पर दिखाई पड़ी.
सबसे गंभीर मुद्दा मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का उठता है. आंकड़ों के हवाले से कहा गया कि लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए, और इसमें अनुपातिक रूप से मुस्लिम समुदाय ज्यादा प्रभावित हुआ. जिन सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, वहां बड़ी संख्या में नाम काटे जाने का दावा इस चुनाव के गणित को सीधे प्रभावित करता हुआ बताया गया.
प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है. उनके अनुसार, भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में “मुस्लिम विरोध” एक केंद्रीय तत्व बन चुका है, और अलग-अलग राज्यों में चुनाव इसी आधार पर लड़े जा रहे हैं. बंगाल में यह और स्पष्ट रूप से सामने आया, जहां मतदाता सूची में बदलाव और ध्रुवीकरण साथ-साथ चलते दिखे.
चुनाव आयोग की प्रक्रिया, “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” जैसे आधारों पर नाम हटाना, और न्यायपालिका की प्रतिक्रिया इन सबको मिलाकर यह कहा गया कि चुनाव की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर असर पड़ा है. योगेंद्र यादव की एक टिप्पणी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह “डिज़ाइन बाय बीजेपी, एक्जीक्यूटेड बाय ईसीआई और सर्टिफाइड बाय सुप्रीम कोर्ट” जैसा परिदृश्य बनता दिख रहा है.
इतिहास के संदर्भ में भी बंगाल की अहमियत पर अपनी बात रखते हुए उन्होने कहा कि विभाजन, सांप्रदायिक राजनीति और लंबे समय तक चली धर्मनिरपेक्ष राजनीति ने यहां एक अलग सामाजिक संतुलन बनाया था, जहां मुसलमान अपेक्षाकृत निश्चिंत होकर राजनीतिक जीवन में भागीदारी कर पाते थे. यही कारण है कि बंगाल का चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर भी निर्णायक माना जा रहा है.
बातचीत का सबसे गंभीर पहलू यह है कि क्या एक समुदाय को धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बनाया जा रहा है. तर्क दिया गया कि अगर किसी समुदाय को वोट देने और प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाए, तो वह सिर्फ सामाजिक रूप से मौजूद रहेगा, लेकिन राजनीतिक रूप से प्रभावहीन हो जाएगा. पूरी चर्चा यहाँ देखी जा सकती है.

