जब मतदाता ही गुम हो जाए: बंगाल चुनाव में लोकतंत्र का अनकहा संकट
आज टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर गंभीर मुद्दों पर चर्चा की गई. शो में वरिष्ठ पत्रकार राजेश चतुर्वेदी भी शामिल हुए. बातचीत में सामने आया कि इस बार चुनाव में सबसे बड़ा सवाल खुद मतदाता को लेकर खड़ा हो गया है. बताया गया कि करीब 90–91 लाख यानी लगभग हर दसवां मतदाता वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग मतदान से बाहर हो सकते हैं.
चर्चा में यह भी कहा गया कि स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं. इसके खिलाफ लाखों लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई है और मामले अदालतों व ट्रिब्यूनल तक पहुंचे हैं. हालांकि, 27 से 35 लाख मामलों में से अब तक केवल 650 पर ही सुनवाई हो सकी है, जिनमें से सिर्फ 139 लोगों को ही दोबारा वोट देने की अनुमति मिली है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद सीमित कार्रवाई पर सवाल उठाए गए.
लाइव शो में यह भी मुद्दा उठा कि इस चुनाव में केंद्रीय चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा बलों की भूमिका काफी प्रमुख नजर आ रही है. जानकारी के मुताबिक, लगभग 2400 कंपनियां केंद्रीय बलों की तैनात की गई हैं. साथ ही, रिपोर्ट्स के अनुसार देशभर से लोगों को ट्रेनों के जरिए बंगाल लाया जा रहा है, जिससे चुनावी माहौल और अधिक जटिल हो गया है.
बातचीत के दौरान यह भी आरोप लगाए गए कि कुछ क्षेत्रों, जैसे भवानीपुर और बालीगंज, में बड़ी संख्या में मतदाताओं खासतौर पर मुस्लिम समुदाय को “अंडर एडजुडिकेशन” में रखा गया है, जिससे वे मतदान नहीं कर पा सकते. इसके अलावा महिलाओं, प्रवासी मजदूरों, सैनिकों और खिलाड़ियों तक के नाम सूची से हटने की बात भी सामने आई, जिससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए.
चर्चा में यह निष्कर्ष निकला कि इस बार चुनाव असल मुद्दों से हटकर पहचान और नागरिकता जैसे सवालों के इर्द-गिर्द घूमता दिख रहा है. यदि इसी तरह की प्रक्रिया जारी रही, तो इसका असर भविष्य में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर पड़ सकता है.

