अपूर्वानंद | एसआईआर के विरोधी दलों को बंगाल चुनाव से दूर रहना चाहिए था. अब उन्होंने मतदाताओं के नाम काटे जाने को सामान्य बना दिया है
चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 2026 विधानसभा चुनाव परिणामों से उभरने वाला सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विचार अब पूरी तरह दफ़न हो चुका है. पराकाल प्रभाकर स्पष्ट पीड़ा के साथ लिखते हैं कि यदि पश्चिम बंगाल में 27 लाख वैध मतदाताओं का मताधिकार छीन लिया जाना हमारी सबसे गहरी चिंता नहीं बनती, तो हमें स्वयं को लोकतंत्र कहना बंद कर देना चाहिए.
सवाल यह नहीं है कि यदि ये 27 लाख नागरिक मतदान कर पाते तो बंगाल का चुनावी नतीजा क्या होता. हमें यह सोचकर बेचैन होना चाहिए कि भारत के लोगों को अब दो वर्गों में बाँटा जा सकता है: वे जिन्हें मतदान का अधिकार दिया जाता है, और वे जिन्हें समय-समय पर इससे वंचित किया जा सकता है. क्या मताधिकार अब एक अधिकार नहीं रहा और एक विशेषाधिकार बन गया है — एक सरकारी चुनाव आयोग द्वारा बनाई गई 'तार्किक' प्रक्रियाओं के ज़रिए प्रदान किया जाने वाला एहसान?
विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, चुनाव आयोग ने राज्य में अस्वाभाविक जल्दबाज़ी में एसआईआर किया और क़रीब 91 लाख नाम मतदाता सूचियों से बाहर कर दिए. आँकड़े बताते हैं कि इनमें से एक बड़े हिस्से का सूचियों में बना रहना भारतीय जनता पार्टी के लिए नुक़सानदेह था. जब मतदाता सर्वोच्च न्यायालय में मतदाता सूचियों में पुनः शामिल किए जाने की माँग लेकर पहुँचे, तो उन्हें बेशर्मी से बता दिया गया कि इस चुनाव में उनकी भागीदारी ज़रूरी नहीं है. कि वे अगले चुनाव में मतदान कर सकते हैं.
इसका निहितार्थ बिल्कुल स्पष्ट है: भारत में अब हर वयस्क मतदान के अधिकार का दावा नहीं कर सकता. लगभग सभी राजनीतिक दलों ने — यहाँ तक कि उन दलों ने भी जो इस प्रक्रिया से असहमत थे और जिन्होंने इसका विरोध किया था — इन 27 लाख नागरिकों के बिना ही चुनाव में आगे बढ़ना चुना. ऐसा करके उन्होंने इस विचार को वैधता दे दी कि भारत में वयस्क मताधिकार अब सार्वभौमिक नहीं, बल्कि एक विशेषाधिकार है, जो सभी को गारंटी के साथ नहीं मिलता.
जिन लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार इस तरह छीने गए, उन्होंने देखा कि कोई भी राजनीतिक दल उन्हें इतना महत्वपूर्ण नहीं समझता कि उनके साथ खड़ा हो. ऐसे में यह विलाप करना व्यर्थ है कि ममता बनर्जी भवानीपुर में 15,000 वोटों से हारीं, जबकि वहाँ 47,000 नाम सूचियों से काट दिए गए थे. यदि उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया होता — उस चुनाव में भाग लेने से मना कर दिया होता जिसने इन 47,000 को बाहर रखा — तो उन्हें एक नैतिक जीत मिली होती. अब नहीं.
कुछ लोग बताते हैं कि भाजपा और ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के बीच का अंतर महज़ 13 लाख वोटों का है, जबकि क़रीब 27 लाख लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया गया. यदि वे भाग लेते तो क्या नतीजा अलग होता? यह सवाल भी अब अप्रासंगिक हो चुका है, क्योंकि विपक्ष और ममता दोनों ने इन 'हटाए गए' मतदाताओं के बिना ही चुनाव लड़ना चुना, जो पूरी तरह जीवित और वैध थे.
इन मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा में कोई नहीं उठा, जिनके अधिकारों का चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने हनन किया. यह लोकतंत्र के भीतर किया जा सकने वाला सबसे गंभीर अन्याय था, फिर भी यह ग़ैर-भाजपा दलों के लिए इतना गंभीर नहीं लगा कि वे तब तक भागीदारी से इनकार करते जब तक इन नागरिकों के अधिकार बहाल नहीं हो जाते. हाँ, ममता बनर्जी सर्वोच्च न्यायालय ज़रूर गईं और उनकी पुनः वापसी की माँग की, लेकिन न उनके लिए और न अन्य दलों के लिए यह इतना अहम मुद्दा था कि वे यह घोषित कर सकें कि एक ऐसे चुनाव में भाग लेने का कोई अर्थ नहीं जिसमें असली लोगों को एक मनमानी और ग़ैरक़ानूनी प्रक्रिया के ज़रिए भाग लेने से रोक दिया गया हो.
यदि राजनीतिक दल मतदाताओं से अपने साथ खड़े रहने की उम्मीद रखते हैं, तो उन्हें पहले यह दिखाना होगा कि वे मतदाताओं के साथ खड़े हैं. दुर्भाग्य से, दल ऐसा करने में विफल रहे हैं.
कुछ ऐसी ही और अधिक चिंताजनक घटना असम में हुई, जहाँ निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को इस तरह अंजाम दिया गया है कि मुस्लिम मतदाताओं का चुनावी भार उनकी आबादी के अनुपात में कम कर दिया गया है. वे निर्वाचन क्षेत्र जहाँ वे कभी निर्णायक प्रभाव डाल सकते थे, उनकी संख्या घटा दी गई है.
सीमाओं को इस तरह खींचा गया है कि भाजपा विरोधी मतदाता मुट्ठी भर निर्वाचन क्षेत्रों में सिमट गए हैं, जबकि भाजपा और उसके सहयोगियों के समर्थकों को सुनियोजित सटीकता के साथ एक व्यापक भूभाग में फैला दिया गया है. परिणाम संरचनात्मक है: यहाँ तक कि यदि ग़ैर-भाजपा दल संकेंद्रित समर्थन वाले इलाक़ों में भारी बहुमत — 70 या 80 प्रतिशत — भी हासिल कर लें, तो भी उनके कुल सीट-अंश पर बंधन बना रहेगा.
यह मुसलमानों का चुनावी घेटोकरण है.
इस प्रकार, भारत के लोगों को दो अलग तरीक़ों से और दो अलग वर्गों में बाँटा जा रहा है: वे जो मतदान अधिकार से संपन्न हैं और वे जो उससे वंचित हैं. इन दोनों के बीच कोई जैविक एकजुटता नहीं बचेगी. व्यक्ति इसके बजाय, जैसे भी हो सके, पहले वर्ग में अपनी जगह सुरक्षित करने की कोशिश करेंगे. और यदि यह व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया गया कि केवल मुसलमानों को ही मताधिकार से वंचित किया जाना है, तो कोई व्यापक प्रतिरोध नहीं होगा.
जहाँ मुसलमानों को पूरी तरह मतदान अधिकार से नहीं वंचित किया जा सकता, वहाँ निर्वाचन क्षेत्रों को इस तरह फिर से खींचा जाएगा कि वे किसी राज्य के समग्र चुनावी नतीजे को प्रभावित करने में अक्षम हो जाएँ. उन्हें सीमित इलाक़ों में क़ैद कर दिया जाएगा, सरकारें बनाने में उनकी राजनीतिक अहमियत को क़रीब-क़रीब नगण्य बना दिया जाएगा.
2026 विधानसभा चुनावों में बंगाल और असम में जो किया गया है, वह उस परियोजना की दिशा में एक निर्णायक क़दम है जिसे विनायक दामोदर सावरकर और माधव सदाशिव गोलवलकर ने बहुत पहले स्पष्ट किया था: एक ऐसे भारत का निर्माण जिसमें हिंदू हितों को मुसलमानों के हितों से अलग कर दिया जाए. मुसलमान शारीरिक रूप से अस्तित्व में रह सकते हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से वे मृत कर दिए जाएँगे: उपस्थित, दृश्यमान, फिर भी लोकतांत्रिक जीवन से रहित.
अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं. यह लेख द वायर से लिया और अनूदित किया गया है.

