कश्मीर के सरकारी कर्मचारी पर ‘नार्को-टेरर’ का मामला कैसे बना, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने छह साल बाद दी जमानत
जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण विकास विभाग में कार्यरत सरकारी कर्मचारी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जून 2020 में नार्को-टेररिज्म यानी मादक पदार्थों की तस्करी के जरिए आतंकवाद को फंडिंग देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. लगभग छह साल जेल में बिताने के बाद मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी. जमानत आदेश में अदालत ने कई ऐसे सवाल उठाए, जिन्होंने जांच एजेंसियों के पूरे मामले पर गंभीर संदेह खड़ा कर दिया.
बेतवा शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अंद्राबी या उनके कार्यस्थल से न तो कोई नकदी बरामद हुई थी और न ही कोई मादक पदार्थ. उनके खिलाफ जिन आत्मस्वीकृतिपूर्ण बयानों का इस्तेमाल किया गया, वे भारतीय कानून के तहत स्वीकार्य नहीं थे. अदालत ने यह भी नोट किया कि उनका पहले कभी आतंकवादी गतिविधियों या ड्रग तस्करी से कोई संबंध नहीं पाया गया था. उल्टा, वे एक सरकारी कर्मचारी और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के सक्रिय कार्यकर्ता थे.
यह मामला अगस्त 2019 से शुरू होता है, जब अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर निवारक हिरासतें की गईं. अंद्राबी को भी पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत हिरासत में लिया गया. उस समय पुलिस द्वारा तैयार किए गए डोजियर में उन्हें एक राजनीतिक कार्यकर्ता बताया गया था. कहीं भी आतंकवादी संगठनों से संबंध या ओवरग्राउंड वर्कर होने का आरोप नहीं लगाया गया था.
हालांकि अप्रैल 2020 में उनकी निवारक हिरासत रद्द कर दी गई और वे रिहा हो गए. लेकिन रिहाई के कुछ ही सप्ताह बाद, 11 जून 2020 को उन्हें एनडीपीएस कानून के तहत एक नए मामले में गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने जांच अपने हाथ में ले ली और दावा किया कि यह सिर्फ ड्रग तस्करी का मामला नहीं बल्कि आतंकवाद को फंडिंग से जुड़ा नेटवर्क है.
एनआईए के आरोपपत्र के अनुसार, अंद्राबी के दामाद और अन्य आरोपियों से हेरोइन और बड़ी मात्रा में नकदी बरामद हुई. एजेंसी ने दावा किया कि अंद्राबी के पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन से जुड़े लोगों से संबंध थे. उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने 2016 और 2017 में पाकिस्तान की यात्रा के दौरान आतंकवादी नेटवर्क से मुलाकात की थी और ड्रग्स के कारोबार से प्राप्त धन आतंकवादी संगठनों तक पहुंचाया था.
लेकिन बचाव पक्ष ने इन दावों को अदालत में चुनौती दी. वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने कहा कि जिन दो कथित आतंकवादी कमांडरों से अंद्राबी के संबंध होने का दावा किया गया, उनमें से एक व्यक्ति वर्ष 2000 में ही मर चुका था जबकि दूसरा जम्मू-कश्मीर में सरकारी कर्मचारी था. उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियां यह साबित ही नहीं कर सकीं कि आरोपपत्र में जिन लोगों का उल्लेख किया गया है, वे वास्तव में कौन थे.
फरसात ने यह भी बताया कि अंद्राबी के कॉल डिटेल रिकॉर्ड में किसी आतंकवादी से संपर्क का कोई प्रमाण नहीं मिला. जब अभियोजन पक्ष ने व्हाट्सऐप चैट का हवाला दिया, तब सुप्रीम कोर्ट ने वे चैट रिकॉर्ड दिखाने को कहा. अदालत के अनुसार, अभियोजन पक्ष ऐसा करने में विफल रहा.
मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू कथित बरामदगी से जुड़ा था. एनआईए का कहना था कि अंद्राबी के खुलासे के आधार पर हेरोइन और नकदी बरामद हुई. लेकिन बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि उनका कथित बयान इतना अस्पष्ट था कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. कानून के अनुसार, किसी आरोपी की पुलिस के सामने दी गई जानकारी तभी स्वीकार्य होती है जब वह किसी वस्तु की सटीक और प्रत्यक्ष बरामदगी तक ले जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी गौर किया कि अंद्राबी को गिरफ्तार हुए लगभग छह साल हो चुके थे और मुकदमे में अभी भी 350 गवाहों की गवाही बाकी थी. अदालत ने माना कि निकट भविष्य में मुकदमे के समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है. ऐसे में उन्हें अनिश्चितकाल तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होगा.
अपने फैसले में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि यदि मुकदमे में अत्यधिक देरी हो रही है तो यूएपीए जैसे कठोर कानूनों में भी जमानत दी जानी चाहिए. अदालत ने यह भी याद दिलाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में भी संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
अंद्राबी का मामला केवल एक व्यक्ति की लंबी कैद की कहानी नहीं है. यह उस व्यापक सवाल को भी सामने लाता है कि क्या कठोर आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल ऐसे मामलों में किया जा रहा है जहां सबूत कमजोर हैं, लेकिन आरोपी वर्षों तक जेल में रहने को मजबूर हो जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां इस बात की ओर संकेत करती हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लगाए गए आरोपों की भी न्यायिक जांच उतनी ही कठोर होनी चाहिए जितनी किसी अन्य आपराधिक मामले में होती है. वरना मुकदमे से पहले की लंबी कैद ही अपने आप में सजा बन जाती है.

