कुणाल पुरोहित | मुझे नहीं लगता प्लेटफॉर्म्स की कोई आइडियोलॉजी है, वे सत्ता और धंधे के साथ हैं

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने पत्रकार, लेखक और शोधकर्ता कुणाल पुरोहित से बातचीत की. चर्चा का केंद्र हिंदुत्व पॉप संगीत, उससे जुड़े नफरत फैलाने वाले गीतों और डिजिटल मंचों की भूमिका रही. हाल ही में कुणाल पुरोहित और उनके सहयोगियों ने एक अध्ययन तैयार किया है, जिसमें यह समझने की कोशिश की गई है कि किस तरह नफरत फैलाने वाला संगीत आज एक बड़े डिजिटल कारोबार का हिस्सा बन चुका है.

बातचीत की शुरुआत इस सवाल से हुई कि कुछ वर्षों पहले तक सीमित दायरे में दिखाई देने वाला यह संगीत आज देशभर में इतनी तेजी से कैसे फैल गया. कुणाल पुरोहित ने बताया कि जब उन्होंने अपनी पुस्तक एच-पॉप लिखी थी, तब ऐसे गीत मुख्य रूप से छोटे शहरों और कस्बों में सुनाई देते थे. लेकिन अब यह स्थिति बदल चुकी है. आज ऐसे गीत बड़े शहरों, धार्मिक आयोजनों, जुलूसों और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच चुके हैं. उनके अनुसार यह केवल संगीत नहीं है, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक परियोजना का हिस्सा है.

अध्ययन के अनुसार चार प्रमुख डिजिटल मंचों पर 523 ऐसे गीतों की पहचान की गई है, जिनमें मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ घृणा, अपमानजनक भाषा या हिंसा को बढ़ावा दिया गया है. इनमें से 263 गीत सीधे तौर पर हिंसा की बात करते हैं. चर्चा के दौरान नितीश त्यागी ने इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिलाया कि लाखों छोटी वीडियो और करोड़ों दर्शकों तक पहुंचने वाले ये गीत अब केवल मनोरंजन की सामग्री नहीं रह गए हैं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पैदा करने का माध्यम बन चुके हैं.

कुणाल पुरोहित का कहना था कि इस पूरी प्रक्रिया में डिजिटल मंचों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. उनके अनुसार इन मंचों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज दर्शकों की भागीदारी और उससे होने वाली कमाई है. नफरत, उत्तेजना और टकराव पैदा करने वाली सामग्री अधिक लोगों का ध्यान खींचती है. इसी कारण ऐसे गीतों को बार-बार आगे बढ़ाया जाता है. उन्होंने इसे "नफरत का एल्गोरिदम" बताते हुए कहा कि मंच अप्रत्यक्ष रूप से रचनाकारों को संकेत देते हैं कि अधिक भड़काऊ सामग्री अधिक लोकप्रिय और लाभदायक है.

बातचीत में यह सवाल भी उठा कि इस पूरी व्यवस्था में केवल गीत बनाने वाले ही नहीं, बल्कि विज्ञापनदाता और बड़ी कंपनियां भी कहीं न कहीं शामिल दिखाई देती हैं. अध्ययन में अनेक ऐसे ब्रांडों का उल्लेख किया गया है जिनके विज्ञापन इन वीडियो के साथ प्रदर्शित हुए. नितीश त्यागी ने पूछा कि क्या कंपनियों को यह पता है कि उनके विज्ञापन किस प्रकार की सामग्री के साथ दिखाए जा रहे हैं. इस पर कुणाल पुरोहित ने कहा कि कंपनियों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि वे नफरत और हिंसा फैलाने वाली सामग्री का समर्थन नहीं करतीं.

चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा युवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी रहा. कुणाल पुरोहित के अनुसार हिंदुत्व पॉप की पूरी संरचना युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर तैयार की गई है. लोकप्रिय संस्कृति, छोटे वीडियो और आकर्षक प्रस्तुतियों के माध्यम से विचारधारा को मनोरंजन के रूप में पेश किया जाता है. यही कारण है कि यह केवल डिजिटल सामग्री का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज के भविष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा मुद्दा भी है.

बातचीत के अंत में निधीश त्यागी और कुणाल पुरोहित ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि जब सत्ता, कारोबार और डिजिटल मंचों के हित एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं, तब जवाबदेही का संकट और गहरा हो जाता है. उन्होंने कहा कि नागरिकों को यह समझना होगा कि नफरत का यह कारोबार केवल आभासी दुनिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर समाज, राजनीति और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है. इसलिए इस पर सवाल उठाना और जवाबदेही की मांग करना लोकतांत्रिक समाज की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है.पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं. पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं.

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