प्रो. संतोष मेहरोत्रा | रोजगार कहीं अधिक पैदा हो सकता था, अगर सरकार ने समग्र औद्योगिक नीति अपनाई होती

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. संतोष मेहरोत्रा से भारत में रोजगार, बेरोजगारी और आर्थिक नीतियों के असर पर विस्तार से बातचीत की. उनकी नई पुस्तक इंडिया आउट ऑफ वर्क के बहाने यह चर्चा उस सवाल पर केंद्रित रही कि दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल भारत अपने युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार क्यों नहीं पैदा कर पा रहा है.

प्रो. मेहरोत्रा ने कहा कि पिछले डेढ़ दशक में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़े. उनके अनुसार हर साल बड़ी संख्या में युवा नौकरी की तलाश में बाजार में आते हैं, जबकि गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार सृजन की गति कमजोर बनी हुई है. इसका नतीजा बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं में निराशा के रूप में सामने आ रहा है.

निधीश त्यागी ने सरकार के रोजगार संबंधी दावों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि रोजगार बढ़ रहे हैं तो युवाओं में बेचैनी क्यों बढ़ रही है. इस पर प्रो. मेहरोत्रा ने कहा कि कोविड के बाद बड़ी संख्या में लोग मजबूरी में कृषि क्षेत्र की ओर लौटे, लेकिन इसे नया रोजगार नहीं कहा जा सकता. उन्होंने यह भी कहा कि बड़ी संख्या में युवा ऐसे हैं जो न शिक्षा में हैं, न रोजगार में और न किसी प्रशिक्षण से जुड़े हैं.

बातचीत में सरकारी नौकरियों, भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक के मुद्दे पर भी चर्चा हुई. प्रो. मेहरोत्रा के अनुसार निजी क्षेत्र में अवसर कम होने से सरकारी नौकरियों पर दबाव बढ़ा है, लेकिन भर्ती प्रक्रिया पर उठते सवालों ने युवाओं का भरोसा कमजोर किया है.

उन्होंने नोटबंदी, जीएसटी के क्रियान्वयन और कोविड लॉकडाउन को रोजगार संकट के प्रमुख कारणों में गिनाया. उनका कहना था कि इन फैसलों का सबसे ज्यादा असर छोटे उद्योगों और एमएसएमई क्षेत्र पर पड़ा, जो रोजगार पैदा करने के सबसे बड़े स्रोत हैं.

आर्थिक विकास के दावों पर टिप्पणी करते हुए प्रो. मेहरोत्रा ने कहा कि केवल दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होना पर्याप्त नहीं है. असली सवाल यह है कि आम नागरिक की आय, रोजगार और जीवन स्तर में कितना सुधार हुआ है. उन्होंने बढ़ती आर्थिक असमानता और बड़ी आबादी की सरकारी सहायता पर निर्भरता को भी चिंता का विषय बताया.

युवाओं के लिए उनका संदेश था कि केवल सरकारी नौकरी को ही लक्ष्य न बनाएं. नई तकनीकों और बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप लगातार नई स्किल्स सीखना जरूरी है. वहीं सरकार के लिए उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, अप्रेंटिसशिप और श्रम-प्रधान उद्योगों में बड़े निवेश की जरूरत बताई.पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं.

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