ग्रेट निकोबार परियोजना: विकास की दौड़ में पीछे छूटते जनजातीय अधिकार

‘आर्टिकल 14’ में ऋषिका पारदीकर की रिपोर्ट है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सुदूर दक्षिणी हिस्सा, ग्रेट निकोबार, इन दिनों एक विशालकाय विकास परियोजना और उससे उपजे विवादों के केंद्र में है. 92,000 करोड़ रुपये की इस महा-परियोजना का उद्देश्य आर्थिक और रणनीतिक लाभ प्राप्त करना है, लेकिन इसकी कीमत वहां की प्राचीन पारिस्थितिकी और सदियों से रह रही जनजातियों, विशेषकर 'शोंपेन'  को चुकानी पड़ रही है.

अधिकारों का उल्लंघन और एएजेवीएस की भूमिका

हालिया विवादों का मुख्य कारण 'अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति' (एएजेवीएस) द्वारा दी गई वह सहमति है, जिसके लिए वह कानूनी रूप से अधिकृत नहीं थी. एएजेवीएस का गठन जनजातियों के कल्याण के लिए किया गया था, लेकिन आरोप है कि इसने शोंपेन जनजाति की ओर से परियोजना के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया. विशेषज्ञों और पूर्व सदस्यों, जैसे मानवविज्ञानी त्रिलोकनाथ पंडित का तर्क है कि इस संस्था के पास जनजातियों की पैतृक भूमि को सौंपने का कोई अधिकार नहीं है.

यह परियोजना केवल कंक्रीट का ढांचा नहीं है, बल्कि यह एक प्राचीन वर्षावन के विनाश की कहानी भी है. अनुमान है कि इस परियोजना के लिए लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) पेड़ काटे जाएंगे. यह क्षेत्र निकोबार मेगापॉड और जाइंट लेदरबैक कछुए जैसी दुर्लभ प्रजातियों का एकमात्र ठिकाना है. पर्यावरणविदों का मानना है कि 'प्रतिपूरक वनीकरण' के नाम पर हरियाणा जैसे राज्यों में पेड़ लगाना, निकोबार के सदियों पुराने वर्षावन की भरपाई कभी नहीं कर सकता.

शोंपेन और निकोबारी समुदायों का संघर्ष

शोंपेन एक अर्ध-खानाबदोश जनजाति है जो बाहरी दुनिया से लगभग कटी हुई है. उनकी अपनी भाषा और संस्कृति है जो पूरी तरह से जंगलों पर निर्भर है. परियोजना के कारण उनके आवास और आजीविका पर सीधा खतरा मंडरा रहा है. वहीं निकोबारी समुदाय, जिन्होंने शुरुआत में दबाव में आकर सहमति दी थी, अब उसे वापस ले लिया है. उनका कहना है कि उन्हें परामर्श के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया.

भारत सरकार का दावा है कि यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. सरकार के अनुसार, इससे किसी भी जनजाति का विस्थापन नहीं होगा. हालांकि, विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य विशेषज्ञों ने इसे 'देश की प्राकृतिक विरासत के खिलाफ अपराध' करार दिया है. हालिया रिपोर्टों में स्थानीय प्रशासन द्वारा एक 'पुनर्वास योजना' तैयार करने की बात भी सामने आई है, जो सरकार के 'कोई विस्थापन नहीं' वाले दावे पर सवाल खड़े करती है.

शिकार और शोषण के गंभीर आरोप

लेख में एएजेवीएस के अधिकारियों पर गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं. पूर्व कर्मचारियों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह संस्था जनजातियों के कल्याण के बजाय शिकारियों की मदद करने और जंगलों में अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देने का अड्डा बन गई है. जनजातियों को तंबाकू और शराब जैसे नशीले पदार्थों की आपूर्ति कर उनके संसाधनों तक पहुंच बनाने के आरोप भी चिंताजनक हैं.

विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना हमेशा से एक चुनौती रहा है, लेकिन जब विकास की कीमत एक पूरी संस्कृति और प्रजाति का अस्तित्व हो, तो पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है. कलकत्ता उच्च न्यायालय में लंबित यह मामला केवल एक परियोजना का नहीं, बल्कि भारत के संवैधानिक वादों और जनजातीय अधिकारों की रक्षा की परीक्षा है. क्या हम एक 'हांगकांग' बनाने की चाह में अपनी सबसे प्राचीन और दुर्लभ विरासत को खोने के लिए तैयार हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर आने वाली पीढ़ियां हमसे मांगेंगी.

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