सुवेंदु अधिकारी: अवसरवाद, आरोप और सत्ता की भूख से बना 'नेता'
9 मई 2026 को पश्चिम बंगाल के 9वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले सुवेंदु अधिकारी की कहानी किसी आदर्शवादी नेता की नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक खिलाड़ी की है जिसने हर पार्टी, हर विचारधारा और हर गठबंधन का इस्तेमाल केवल अपनी महत्वाकांक्षा की सीढ़ी के रूप में किया. कांग्रेस से तृणमूल, तृणमूल से भाजपा. यह महज़ एक राजनीतिक यात्रा नहीं है, यह अवसरवाद की पाठ्यपुस्तक है.
पूर्व मेदिनीपुर के एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आने वाले अधिकारी ने 1995 में कांग्रेस से राजनीति शुरू की, फिर 2000 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में चले गए, और 2020 में अमित शाह की गोद में जा बैठे. हर बार बदलाव का कारण सिद्धांत नहीं, सत्ता थी.
नंदीग्राम: नायक या मौक़ापरस्त?
अधिकारी अपने राजनीतिक करियर की नींव नंदीग्राम आंदोलन (2006-2007) पर रखते हैं. भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति (बीयूपीसी) के ज़रिए उन्होंने वाम मोर्चे की भूमि अधिग्रहण नीति के ख़िलाफ़ आंदोलन की अगुवाई की और ख़ुद को जनता का चैंपियन घोषित किया.
लेकिन इस तस्वीर का एक और पहलू भी है. राज्य सीआईडी ने आरोप लगाया कि उस आंदोलन के दौरान माओवादियों को हथियार सप्लाई से उनके संबंध थे. हालाँकि अधिकारी ने इसे नकारा. यह वही नंदीग्राम था जहाँ हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए थे. तो क्या वे सच में जनता के नायक थे, या केवल अशांति के सबसे चालाक लाभार्थी?
शारदा, नारद और नोटों की गड्डी
अधिकारी का राजनीतिक रिकॉर्ड केवल उनकी वक्तृत्व कला और संगठन कौशल का नहीं, बल्कि गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों का भी है.
शारदा चिट फंड घोटाला: सीबीआई ने 2014 में उन्हें इस पोंज़ी स्कीम से कथित संबंधों के मामले में पूछताछ के लिए बुलाया. शारदा समूह के सुदीप्त सेन ने 2020 में उन पर सीधे तौर पर जबरन वसूली का आरोप लगाया. कोई दोषसिद्धि नहीं हुई. लेकिन भाजपा में शामिल होने के बाद जाँच की रफ़्तार भी जादुई ढंग से धीमी पड़ गई.
नारद स्टिंग ऑपरेशन (2014): यह मामला और भी सीधा है. स्टिंग ऑपरेटर मैथ्यू सैमुअल के कैमरे पर कथित रूप से नक़द रिश्वत लेते हुए उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग सामने आई. कई अन्य टीएमसी नेताओं को सीबीआई ने गिरफ़्तार किया. लेकिन भाजपा में जाने के बाद अधिकारी पर हाथ नहीं पड़ा. सैमुअल ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया कि उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं किया गया. और भाजपा ने अपने यूट्यूब चैनल से उनसे संबंधित वीडियो हटा दिए.
2026 के चुनावी हलफ़नामे में उनके ख़िलाफ़ 25 मामले दर्ज हैं. हत्या के प्रयास से लेकर मनी लॉन्ड्रिंग तक. वे इन सभी को राजनीति से प्रेरित बताते हैं. जो हर भ्रष्ट नेता की प्रिय दलील है.
'तोलाबाज़ भाइपो हटाओ' और ख़ुद सीएम बन जाओ
2020 में टीएमसी छोड़ने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. आधिकारिक बयान यह था कि वे भ्रष्टाचार से तंग आ गए थे. असली कहानी यह है कि ममता बनर्जी ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाना शुरू किया, और अधिकारी जो ख़ुद को नंबर दो समझते थे, को यह रास नहीं आया.
उन्होंने नारा लगाया: "तोलाबाज़ भाइपो हटाओ" (जबरन वसूली करने वाले भतीजे को हटाओ). और ममता ने जवाब दिया कि उन्हें उनका "असली चेहरा" पहचानने में देर हो गई. यह पारस्परिक निंदा किसी राजनीतिक आदर्श की नहीं, एक टूटे हुए सत्ता-गठबंधन की भाषा है.
19 दिसंबर 2020 को अमित शाह के साथ एक रैली में उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली. कोई वैचारिक रूपांतरण नहीं, कोई आत्मचिंतन नहीं बस एक नई पार्टी, एक नई सीढ़ी.
सांप्रदायिक बयानबाज़ी: राष्ट्रवाद या ध्रुवीकरण?
अधिकारी की राजनीतिक शैली का एक और स्थायी तत्व है — सांप्रदायिक और विभाजनकारी भाषा. टीएमसी ने उनके कई वीडियो संकलित किए हैं जिनमें वे ममता बनर्जी को "बेगम" कहते हैं, बंगाल के कुछ इलाक़ों को "मिनी पाकिस्तान" बताते हैं, रोहिंग्या और "घुसपैठियों" पर आक्रामक टिप्पणियाँ करते हैं, और बांग्लादेश हिंसा पर उकसावे वाले बयान देते हैं.
उनके समर्थक इसे राष्ट्रवाद और सुरक्षा की भाषा कहते हैं. लेकिन आलोचकों का कहना है कि "बांग्लादेशी घुसपैठिए" और "भारतीय मुसलमान" के बीच की लकीर उनके भाषणों में अक्सर जानबूझकर धुंधली कर दी जाती है. ताकि चुनावी ध्रुवीकरण अधिकतम हो सके. टेलीग्राफ इंडिया सहित कई प्रकाशनों ने ऐसे भाषणों को दस्तावेज़ीकृत किया है.
ममता को दो बार हराया या दो बार भाग्य मिला?
2021 में नंदीग्राम में ममता बनर्जी को ~1,956 वोटों के अंतर से हराना और फिर 2026 में भवानीपुर में उन्हें परास्त . यह अधिकारी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जाती है. लेकिन इस "जीत" की पृष्ठभूमि क्या है?
2026 में भवानीपुर से 47,000 नाम मतदाता सूचियों से काट दिए गए थे. जैसा कि द वायर में अपूर्वानंद लिखते हैं, ममता 15,000 वोटों से हारीं . जबकि 47,000 संभावित मतदाता चुनाव से बाहर थे. तो यह नैतिक जीत थी, या एक ऐसी व्यवस्था का फल जिसमें विरोधी मतदाताओं को पहले ही हटा दिया गया था?
सीएम की कुर्सी, लेकिन किस क़ीमत पर?
मुख्यमंत्री बनते ही उनके सामने चुनौतियों का अंबार है. उनके निजी सहायक चंद्रनाथ राठ की चुनाव के तुरंत बाद हत्या हो गई. राज्य की वित्तीय स्थिति पहले से जर्जर है. केंद्र और राज्य के बीच दशकों का टकराव विरासत में मिला है.
उन्होंने महिलाओं को 3,000 रुपये मासिक, बेरोज़गार युवाओं को 3,000 रुपये, 1 करोड़ नई नौकरियाँ, UCC लागू करने और 45 दिनों में 7वाँ वेतन आयोग लागू करने का वादा किया है. जिसके लिए राज्य के ख़ज़ाने पर अतिरिक्त 42,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा. यह या तो जनता से किया गया वादा है, या जनता के साथ छल.
सुवेंदु अधिकारी की कहानी आज के भारतीय राजनीतिक परिदृश्य का आईना है. जहाँ सिद्धांत नहीं, सत्ता की भूख राजनीति की धुरी है. एक ऐसा नेता जो माओवाद से जुड़े आरोपों से शुरू होकर, पोंज़ी स्कैम की जाँच से गुज़रकर, नारद के नोटों के कथित वीडियो से बचकर, और सांप्रदायिक भाषणों की आँधी में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा.
उनके समर्थक उन्हें "बंगाल का किंगमेकर" कहते हैं. लेकिन इतिहास यह तय करेगा कि वे वाक़ई जनता के नेता थे. या महज़ एक ऐसे खिलाड़ी, जिन्होंने हर दाँव पर ख़ुद को बचाया और हर बार किसी और की पीठ पर चढ़कर ऊपर पहुँचे.

