चुनाव आयुक्त नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी - "सरकार की मनमानी से स्वतंत्र चुनाव संभव नहीं"
द हिंदू के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने 14 मई 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में केंद्र सरकार की बढ़ती भूमिका पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र को इस पर विचार करने के लिए प्रेरित किया. न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तभी संभव हैं जब चुनाव आयोग वास्तव में स्वतंत्र हो, और यह स्वतंत्रता तभी आएगी जब आयुक्त भी स्वतंत्र हों.
अदालत का यह रुख मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आया. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह क़ानून अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ के फ़ैसले को "विफल" कर देता है. उस फ़ैसले में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की तिकड़ी से मिलकर चयन समिति बनाई गई थी. लेकिन 2023 में — फ़ैसले के कुछ ही महीने बाद — संसद ने एक नया क़ानून पारित करके मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया.
न्यायमूर्ति दत्ता ने अटॉर्नी-जनरल आर. वेंकटरमणि से सीधे पूछा: "संविधान के बाद कौन सा क़ानून सबसे महत्वपूर्ण है? मैं कहूंगा — चुनाव कानून. क्या मैं ग़लत हूँ? लोकतंत्र के बिना कुछ भी नहीं है." अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि चयन समिति में "एक भी बिल्कुल निष्पक्ष व्यक्ति" नहीं है. कैबिनेट मंत्री की मौजूदगी पर अदालत ने कहा कि कोई भी मंत्री प्रधानमंत्री की इच्छा के विरुद्ध जाने की हिम्मत नहीं कर सकता. नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति को लेकर अदालत ने पूछा कि क्या यह महज "दिखावा" है क्योंकि नियुक्ति सर्वसम्मति के बिना भी हो सकती है.
अटॉर्नी-जनरल वेंकटरमणि ने दलील दी कि यह "अत्यंत काल्पनिक धारणा" होगी कि यह क़ानून केवल आज्ञाकारी आयुक्त ही पैदा करेगा — जब तक ज़मीन पर कोई वास्तविक चूक न हो. उन्होंने कहा: "जब तक हलवा चखें नहीं, यह कैसे कह सकते हैं कि हलवा ख़राब है?" न्यायमूर्ति दत्ता ने इसके जवाब में कहा कि चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना ही काफ़ी नहीं, उसे स्वतंत्र दिखना भी ज़रूरी है.
अटॉर्नी-जनरल ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट "संसद का दूसरा सदन" नहीं बन सकता और संसद को अदालती फ़ैसलों का शब्द-दर-शब्द पालन करने वाले क़ानून बनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अनूप बरनवाल मामले में अदालत ने अनुच्छेद 141 के तहत कोई क़ानून घोषित नहीं किया था, बल्कि केवल संसद द्वारा अनुच्छेद 324(2) के तहत क़ानून बनाए जाने तक की अस्थायी व्यवस्था दी थी.
सुनवाई के अंत में पीठ ने इन याचिकाओं को संविधान पीठ के पास भेजने का सुझाव दिया. याचिकाकर्ताओं ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह मामला 2023 के क़ानून को एक "सामान्य चुनौती" है और इसमें अनुच्छेद 145(3) के तहत बड़ी पीठ के लिए कोई "पर्याप्त संवैधानिक प्रश्न" नहीं है.

