आकार पटेल | ओडिशा में ईसाइयों के ख़िलाफ़ अत्याचार

इस महीने मैं ओडिशा में था. एक जन-न्यायाधिकरण (पीपल्स ट्रिब्युनल) के हिस्से के तौर पर, जो ईसाइयों के ख़िलाफ़ अत्याचारों की जाँच कर रहा था — ख़ासकर आदिवासियों के ख़िलाफ़. मैं और न्यायाधिकरण के दूसरे सदस्य, करवान-ए-मोहब्बत संगठन के साथ नबरंगपुर, जयपुर, बालासोर और बारीपदा गए. वहाँ हमने क़रीब 300 महिलाओं और पुरुषों की गवाहियाँ सुनीं, जिनमें से 90 प्रतिशत से ज़्यादा आदिवासी थे.

जो हमने सुना और देखा, उससे यह साफ़ है कि पिछले दो वर्षों में ओडिशा की सरकार एक तरफ़ हट गई है — और इसने व्यक्तियों के संवैधानिक और मौलिक अधिकारों को रौंदे जाने दिया है. ईसाइयों के ख़िलाफ़ संगठित हिंसा को अनुमति दी जा रही है. और जब सरकारी तंत्र हरकत में आता है, तो ज़्यादातर पीड़ितों को न्याय मिलने से रोकने की कोशिश में.

हिंसा एक तय साँचे में ढल गई है — जैसा इस देश में हिन्दुत्ववादी कार्रवाइयों के साथ होता आया है. कोई एक घटना होती है — अक्सर किसी क़ानून के पास होने से शुरू होती है — और फिर एक जैसी घटनाओं की बाढ़ आ जाती है. गोमांस के नाम पर लिंचिंग, लव जिहाद, बुलडोज़र — और इसी तरह. एक और बात जो साफ़ दिखी वो यह थी कि अत्याचारों की रफ़्तार तेज़ होती जा रही है — जैसे-जैसे यह साँचा पूरे राज्य में समझा जा रहा है और दोहराया जा रहा है.

ओडिशा में हमने चार तरह के अत्याचार देखे.

पहला — आदिवासी ईसाइयों को ज़बरदस्ती दफ़नाने से रोकना. उन्हें अब गाँव के उस साझा क़ब्रिस्तान में अपने मृतकों को दफ़नाने की इजाज़त नहीं दी जा रही जहाँ दूसरे आदिवासी दफ़नाए जाते हैं. यहाँ तक कि उन्हें अपनी ख़ुद की ज़मीन पर भी दफ़नाने से रोका जा रहा है. भीड़ जमा होकर जनाज़े की नमाज़ और दफ़नाने को शारीरिक रूप से रोकती है. शव इंतज़ार में पड़े रहते हैं — कभी बर्फ़ पर, कभी सड़ते हुए — जब तक "बातचीत" चलती रहती है. पुलिस की दिलचस्पी क़ानून से ज़्यादा "शांति" में है — यानी वो कोई झंझट नहीं चाहती, इसलिए भीड़ का साथ देती है.

दूसरा — ईसाइयों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार. जो लोग उनसे मेल-जोल रखें या उन्हें सामान बेचें उन पर जुर्माना लगाया जाता है. यहाँ तक कि परिवारों को अपने बेटे-बेटियों को घर से निकालने पर मजबूर किया गया. इनमें से कई लोगों के पास न काम है न गुज़ारे का कोई ज़रिया. कई जंगल में रह रहे हैं. और इन मामलों में से लगभग सभी इसी साल के हैं — बहुत से तो पिछले दो महीनों के.

तीसरा — ईसाई आराधना स्थलों पर हमले. चैपलों, घरेलू गिरजाघरों, पादरियों और पुरोहितों पर. प्रार्थना सभाओं और सामूहिक आराधना को ज़बरदस्ती बाधित करने और बंद कराने की कई घटनाएँ हुईं. जब पुलिस आती है, तो पीड़ितों पर ही ग़ैर-क़ानूनी धार्मिक धर्मांतरण के झूठे आरोप लगा दिए जाते हैं. पीड़ितों को जेल में डाल दिया जाता है, जबकि भीड़ आज़ाद घूमती रहती है — यह आम बात हो गई है.

चौथा — और अनुमानित — तरीक़ा था सीधी हिंसा. ईसाई महिलाओं और पुरुषों पर शारीरिक हमले — उन्हें बाँधा गया, पीटा गया, कपड़े उतारे गए, अपमानित किया गया और अपना धर्म मानने के लिए घायल किया गया. (यह पढ़कर शुरुआती ईसाई शहीदों की वो कहानियाँ याद आ गईं जो कभी पढ़ी थीं.)

लोगों को पेड़ से बाँधा गया, बोरों में भरकर पीटा गया. कुछ के साथ यौन हिंसा हुई. कुछ को ज़िंदा जलाने की कोशिश हुई — जो आख़िरी वक़्त पर ही रोकी जा सकी.

इन सबके दौरान सरकार क्या कर रही थी? हिंसा के ज़्यादातर मामलों में पुलिस ने आपराधिक मुक़दमे उन्हीं लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज किए जिन पर हमला हुआ — और फिर उन्हें थानों और जेलों में बंद कर दिया. ऐसे मामले भी सामने आए जहाँ पुलिस ने ख़ुद ईसाइयों को डराने-धमकाने और उनके ख़िलाफ़ हिंसा में सीधी भूमिका निभाई.

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि हमने जो देखा वो जानबूझकर कर्तव्य से मुँह मोड़ना था — और संवैधानिक तंत्र का पूरी तरह ध्वस्त होना था. यह नतीजा अपरिहार्य है. क्योंकि बार-बार लोगों ने हमें बताया कि पुलिस ने हिन्दुत्ववादी संगठनों के साथ मिलकर उन पर दबाव डाला कि वो "समझौता" पत्रों पर दस्तख़त करें — जिनमें वो अपना ईसाई धर्म और सामूहिक आराधना छोड़ने का वादा करते हैं.

राज्य ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया है — यह हैरानी की बात नहीं, क्योंकि अब इसे भारतीय जनता पार्टी चला रही है. और उसकी अल्पसंख्यक-विरोधी विचारधारा से जुड़े तत्वों को खुली छूट दी जा रही है.

न्यायाधिकरण ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखा है — यह उम्मीद करते हुए कि सरकार यह समझे कि यह मामला कितना गंभीर है और उस पर कार्रवाई करना उसकी ज़िम्मेदारी है. शायद सबूत उन्हें हिला दे. हम साँस रोककर इंतज़ार नहीं करेंगे.

आख़िर में एक बात और कहनी है. जिस गरिमा के साथ आदिवासियों ने अपनी आपबीती सुनाई, वो बेमिसाल थी. अपने ख़िलाफ़ हुए अपराधों का ब्यौरा देते हुए वो स्थिर और शांत थे. इनमें महिलाएँ भी थीं. उनमें से एक महिला जब अपने साथ हुई यौन हिंसा का वर्णन कर रही थी, तो एक पल के लिए रुकी, आँखें पोंछीं और फिर बोलती रही.

बहुत से चेहरे मेरे ज़ेहन में बस गए हैं — जैसे वो नोट्स में बसे हैं जो मैंने लिए थे.

एक नौजवान, जब अपनी बात ख़त्म कर रहा था, तो अचानक प्रार्थना करने लगा. हमारे दुभाषिए ने बताया कि यह भजन बाइबल की साम 23 था. मैंने बाद में देखा — यह कुछ ऐसा था जो मुझे स्कूल से याद था:

"प्रभु मेरा चरवाहा है, मुझे किसी बात की कमी न होगी. वो मुझे हरे-भरे मैदानों में लिटाता है. वो मुझे शांत जल के किनारे ले जाता है. वो मेरी आत्मा को ताज़ा करता है. वो अपने नाम के लिए मुझे धर्म के मार्ग पर ले चलता है. हाँ, चाहे मैं मृत्यु की छाया की घाटी में चलूँ, मुझे किसी बुराई का डर न होगा, क्योंकि तू मेरे साथ है."

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