सुशांत सिंह | मोदी और ट्रंप 2.0 की क्षतिग्रस्त साझेदारी खोखले कूटनीतिक दिखावे की कहानी

भारत के बारे में एक ईमानदार बातचीत

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी बैठक के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की ओर से मोदी को व्हाइट हाउस आने का निमंत्रण दिया. भारत में अमेरिकी राजदूत सेर्जियो गोर ने सोशल मीडिया पर इस इशारे को सार्वजनिक रूप से उजागर किया और बातचीत को उपयोगी तथा सहयोग को गहरा करने पर केंद्रित बताया. भारतीय अधिकारियों और मोदी सरकार के आधिकारिक बयानों में इस निमंत्रण का कोई उल्लेख नहीं था. रुबियो ने अपनी तरफ से पत्रकारों को बताया कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी रणनीति की आधारशिला बना हुआ है और द्विपक्षीय संबंध मज़बूत हैं. यह पूरा प्रसंग इस दौरे की केंद्रीय गतिशीलता को सामने रखता है. मोदी सरकार ने बिना कुछ स्वीकार किए एक तनावपूर्ण रिश्ते को संभालने की कोशिश की, जबकि अमेरिकी पक्ष ने निरंतरता का प्रदर्शन किया और किसी भी अंतर्निहित समस्या के विचार को खारिज कर दिया.

इस प्रसंग ने दूसरे ट्रंप प्रशासन के तहत भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती संरचनात्मक खाई को उजागर किया. जबकि आधिकारिक संयुक्त बयानों में साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और एक मज़बूत साझेदारी पर ज़ोर दिया गया, रणनीतिक वास्तविकता एक अलग कहानी कहती है. दौरे के द्विपक्षीय हिस्से से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला केवल महत्वपूर्ण खनिजों पर सहयोग का एक अकेला समझौता हुआ. यह समझौता भी कोई नई सफलता नहीं है, क्योंकि यह चतुर्भुज सुरक्षा संवाद यानी क्वाड और 15 देशों के पैक्स सिलिका ढांचे के भीतर मौजूदा व्यवस्थाओं की नकल मात्र है.

दोनों पक्ष इस रिश्ते की सेहत के निदान पर ही एकमत नहीं थे. भारतीय पक्ष ने इस दौरे को एक साल की गहरी खिंचाव के बाद द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर करने की कोशिश के रूप में देखा. इसके विपरीत रुबियो ने सार्वजनिक रूप से यह सुझाव ही खारिज कर दिया कि इस रिश्ते को बहाली की ज़रूरत है और इसके बजाय यह जताते रहे कि साझेदारी पूरी तरह मज़बूत है. रिश्ते में दिखती दरारों को स्वीकार करने से उनका इनकार नई दिल्ली की रणनीतिक गणनाओं में एक बड़ी खामी को दर्शाता है. ट्रंप प्रशासन अब नई दिल्ली की चिंताओं को मान्यता नहीं देता. अमेरिका कभी भारत का सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार था. वह भरोसा घिस चुका है, जबकि वाशिंगटन दूसरा ही दिखावा करता रहता है. यह एक ऐसी उखड़ी हुई साझेदारी है जो बेमेल उम्मीदों और मूलभूत मतभेदों को दूर करने की सीमित इच्छाशक्ति से चिह्नित है.

मोदी सरकार की सबसे बड़ी उम्मीद अब यही है कि रिश्ता और नीचे न जाए. पिछले पच्चीस वर्षों में भारत-अमेरिका साझेदारी तीन स्थिर स्तंभों पर टिकी रही. पहला हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा रणनीतिक तालमेल, जो भले ही खुलकर न कहा जाता हो, लेकिन चीन को काउंटर करने की दिशा में था. दूसरा  व्यापार और प्रौद्योगिकी पर केंद्रित एक आर्थिक समझ, जिसमें भारत लगातार व्यापार अधिशेष बनाए रखता था. तीसरा कुशल आईटी कामगारों, एच-1बी वीज़ा और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में भारतीय छात्रों द्वारा संचालित मज़बूत जन-से-जन संबंध.

ट्रंप की सौदेबाज़ी वाली राष्ट्रपतीय पद्धति के तहत ये तीनों स्तंभ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं. न रुबियो और न ही राजदूत सेर्जियो गोर इस बात की कोई ठोस आश्वस्ति दे पाए हैं कि इस रुझान को पलटा जा सकता है. रणनीतिक समीकरण नाटकीय रूप से बदल गया है क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप चीनी नेता शी जिनपिंग के साथ सीधे द्विपक्षीय सौदों को तरजीह देते हैं. क्वाड नेताओं के सम्मेलन की अनुपस्थिति ने भारत को बीजिंग के खिलाफ उसके प्राथमिक बाहरी संतुलनकारी से प्रभावी रूप से वंचित कर दिया है और नई दिल्ली को उसके अपने पड़ोस में रणनीतिक रूप से उजागर छोड़ दिया है.

आर्थिक मोर्चे पर ट्रंप प्रशासन ने ऐसी नीतियां लागू की हैं जो सीधे भारत को निशाना बनाती हैं. रुबियो ने इस दौरे का उपयोग एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य घोषित करने के लिए किया. भारत से अपेक्षा है कि वह अगले पाँच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदे. अगर यह लागू हुआ तो यह अनिवार्य रूप से भारत के व्यापार अधिशेष को मिटा देगा और उसे एक विशाल व्यापार घाटे में बदल देगा. इस आक्रामक व्यापार लक्ष्य के साथ-साथ नियमित शुल्क आरोपण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर कड़े प्रतिबंध भी हैं, जो नई दिल्ली की घरेलू विनिर्माण और सुरक्षा महत्वाकांक्षाओं को सीधे चुनौती देते हैं.

आव्रजन पर मागा के प्रतिबंधात्मक रवैये के कारण जन-से-जन संपर्क को नुकसान पहुंचा है. ट्रंप प्रशासन के एच-1बी वीज़ा और ग्रीन कार्ड के नए नियमों ने भारतीय पेशेवरों और छात्रों को बुरी तरह दंडित किया है और उस संरचनात्मक सद्भावना को घिसा दिया है जो कभी द्विपक्षीय संबंधों की नींव थी. रुबियो ने इन मोर्चों पर कोई राहत नहीं दी, बल्कि इन नई आव्रजन नीतियों पर और दृढ़ता दिखाई.

असली सच्चाई यह है कि भारत इस रिश्ते को कार्यशील बनाए रखने की कोशिश कर रहा है और दूसरे ट्रंप कार्यकाल के बाकी समय को न्यूनतम संरचनात्मक नुकसान के साथ गुज़ारने की उम्मीद कर रहा है. लेकिन यह रणनीति उस स्थिरता की मानकर चलती है जो समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मौजूद ही नहीं है. नई दिल्ली में रुबियो का प्रदर्शन इस बात की पुष्टि करता है कि भारत के प्रति अमेरिकी विदेश नीति अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए किसी साझा भू-रणनीतिक दृष्टि से नहीं चलती. यह लगभग पूरी तरह से अमेरिकी घरेलू राजनीतिक मजबूरियों खासकर आव्रजन राजनीति, संरक्षणवादी व्यापार नीतियों और प्रौद्योगिकी संग्रहण से संचालित है.

नई दिल्ली को अब इन स्थायी संरचनात्मक सीमाओं को अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक योजना में शामिल करना होगा. रुबियो और गोर जैसे प्रतीकात्मक कूटनीतिक इशारे जैसे एक जश्न के सार्वजनिक आयोजन के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप को फोन पर लाना वाशिंगटन से किसी टिकाऊ नीतिगत बदलाव में नहीं बदलेंगे. रुबियो के दौरे के दौरान किसी औपचारिक नेता-सम्मेलन की घोषणा के बजाय क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक करने का चुनाव स्पष्ट रूप से इस गठबंधन के अवमूल्यन का संकेत है. इस समूह को अब एक उच्चस्तरीय रणनीतिक गठबंधन के बजाय एक नौकरशाही मंच के रूप में संचालित किया जा रहा है. अमेरिकी घरेलू राजनीति और भारत के बदलते जोखिम-आकलन के इस संगम का चीन के प्रति भारत की नीति पर तत्काल असर पड़ा है. पाकिस्तान और चीन की ओर से अमेरिकी रणनीतिक छत्र के बिना दो-मोर्चे के मिले-जुले खतरे से बचने के लिए मोदी सरकार ने बीजिंग को भारी रियायतें देनी शुरू कर दी हैं.

इसी से समझ आता है कि मोदी सरकार बीजिंग को इतनी छूट क्यों दे रही है. उसने बॉलीवुड फिल्मों को जून 2020 में गलवान झड़प को दिखाने से रोक दिया है जिसमें चीनियों के हाथों 20 भारतीय सैनिक मारे गए थे. फिल्मकारों को बताया गया है कि वे चीन को प्रतिद्वंद्वी के रूप में दिखा या नाम नहीं सकते. भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने मई 2025 में पाकिस्तान के साथ भारत की झड़प के दौरान पाकिस्तान को बीजिंग के बहुप्रचारित रियल-टाइम परिचालन सैन्य समर्थन पर बीजिंग को क्लीन चिट दे दी है. जबकि मोदी सरकार बीजिंग के साथ इन हालिया व्यवहारों को अस्थायी सामरिक समायोजन के रूप में पेश करती है, ये ज़मीन पर नए कूटनीतिक मानदंड स्थापित कर रहे हैं. यह जारी संरचनात्मक पुनर्संरेखण इतनी गहरी जड़ें जमा सकता है कि एक ट्रंप-पश्चात अमेरिकी प्रशासन के लिए भविष्य में भारत को चीन के खिलाफ एक व्यावहारिक रणनीतिक काउंटरवेट के रूप में इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाए.

मोदी सरकार ने दौरे के दौरान अमेरिकी रवैये से अपनी नाराज़गी का संकेत देने की कोशिश की, हालांकि ये कमज़ोर प्रयास कूटनीतिक शिष्टाचार के दायरे तक ही सिमटे रहे. सबसे दिखने वाला संकेत था भारत का रुबियो के सार्वजनिक निमंत्रण को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करने का फैसला यह निमंत्रण सभी आधिकारिक भारतीय प्रेस विज्ञप्तियों और सरकारी मीडिया संचार से गायब था. इसी तरह जब गोर ने 500 अरब डॉलर के खरीद लक्ष्य की घोषणा की और बताया कि भारत इस साल अमेरिका में शीर्ष निवेशक बन गया है, तो भारतीय पक्ष ने इस पर चुप्पी साधना चुना. सरकार के करीबी पत्रकारों को भी रुबियो की प्रेस वार्ता में असामान्य रूप से तीखे और चुनौतीपूर्ण सवाल पूछने की अनुमति दी गई. ये सवाल भारतीय प्रतिष्ठान की ओर से आने वाले अमेरिकी अधिकारी को भारतीय ज़मीन पर कुछ असहज करने का जानबूझकर किया गया प्रयास लगते थे. सब मिलाकर मोदी सरकार इन प्रयासों में नाकाम रही जाहिर तौर पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से.

मोदी सरकार समस्या का नाम लेने में विफल रही. उसने कड़ी कूटनीति के बजाय सार्वजनिक शिष्टता को चुना और वाशिंगटन की रणनीतिक गणना में भारत की घटती भूमिका को स्वीकार कर लिया. रुबियो ने ट्रंप के लेन-देन वाले दबाव को छुपाने के लिए भारत-अमेरिका संबंधों को मज़बूत बताने का नाटक किया. नई दिल्ली मुस्कुराती रही और रिश्ते को बचाने की कोशिश करती रही. यह तरीका दीर्घकालिक दबदबे की कीमत पर अल्पकालिक छवि की रक्षा करता है. एक परिपक्व सरकार ने बाधाओं का नाम लिया होता और जब तक अमेरिका पारस्परिकता बहाल नहीं करता, सहयोग की सीमाएं तय की होतीं. नीति के सार के बजाय फोटो-अवसरों को प्राथमिकता देकर मोदी सरकार ने अमेरिका को इस रिश्ते को एकतरफा परिभाषित करने दिया.

मोदी सरकार का यह रक्षात्मक कूटनीतिक रवैया ट्रंप की विदेश नीति की बदलती संरचनात्मक वास्तविकताओं को ढक नहीं सकता. यह एक ऐसा रिश्ता है जो केवल आदत और जड़ता से टिका है, जिसमें रणनीतिक तर्क उखड़ चुका है. भौतिक परिस्थितियां भारत के विरुद्ध बदल गई हैं. मोदी सरकार के विनम्र संकेत ट्रंप की विदेश नीति की बदलती संरचनात्मक वास्तविकताओं में कोई ठोस फर्क नहीं डालेंगे और भारत को चीन के मुकाबले कमज़ोर रणनीतिक स्थिति में तथा घर में व्यापार और प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर अधिक कमज़ोर छोड़ देंगे.

रुबियो का दौरा इन मौजूदा बाधाओं का स्पष्ट संकेतक था. इसने भारत-अमेरिका संबंधों में घोषित महत्वाकांक्षाओं और वास्तविक नतीजों के बीच बढ़ती खाई को उजागर किया. मोदी सरकार को इसे सावधानीपूर्वक घरेलू संदेश-प्रबंधन से निपटाने के एक और प्रसंग के बजाय गंभीर आंतरिक समीक्षा के लिए एक संकेत के रूप में लेना चाहिए. दांव पर है एक अत्यंत अस्थिर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा और आर्थिक संभावनाएं.

(लेखक सुशांत सिंह येल विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई अध्ययन और राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं. वे द कारवां के परामर्श संपादक और द मॉर्निंग कॉन्टेक्स्ट तथा कोलकाता के द टेलीग्राफ में स्तंभकार हैं. उन्होंने द वायर के सबस्टैक — द इंडिया केबल — की सह-स्थापना की है. उन्हें पत्रकारिता में रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिल चुका है. इससे पहले वे इंडियन एक्सप्रेस के उप-संपादक रहे हैं. पत्रकारिता और शिक्षा जगत में आने से पहले वे भारतीय सेना में कर्नल थे और कोत द'इव्वार में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक के रूप में सेवा कर चुके हैं.)



 

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