श्रवण गर्ग | मोदी जी जब रिकॉर्ड कायम करते जाएंगे, तब जनता अपने अधिकार खोने के भी रिकॉर्ड कायम करती जाएगी.

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में 12 वर्ष पूरे होने के राजनीतिक अर्थ, लोकतंत्र की स्थिति, विपक्ष की कमजोरी, विदेश नीति और भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की. भारतीय जनता पार्टी इन 12 वर्षों को एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है. पार्टी के भीतर जश्न का माहौल है और इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी ने लगातार प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के मामले में जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है. लेकिन सवाल यह है कि किसी लोकतंत्र में किसी नेता के लंबे कार्यकाल का मूल्यांकन केवल सत्ता में बिताए गए वर्षों से होना चाहिए या उसके शासन के प्रभावों से भी.

श्रवण गर्ग का तर्क है कि भाजपा के लिए यह जश्न केवल 12 साल पूरे होने का नहीं है, बल्कि नेहरू के रिकॉर्ड को पार करने का भी है. उनके अनुसार भारतीय राजनीति में नेहरू एक ऐसे संदर्भ बिंदु बने हुए हैं जिनसे तुलना किए बिना भाजपा अपनी उपलब्धियों को परिभाषित नहीं कर पाती. इसी कारण मोदी के कार्यकाल को ऐतिहासिक बनाने की कोशिश लगातार दिखाई देती है. लेकिन लोकतंत्र में इतिहास केवल रिकॉर्ड से नहीं बनता, बल्कि इस बात से बनता है कि सत्ता के दौरान संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और सामाजिक ताने-बाने पर क्या प्रभाव पड़ा.

चर्चा के दौरान श्रवण गर्ग ने यह सवाल उठाया कि यदि मोदी का राजनीतिक प्रभुत्व आगे भी जारी रहता है और वे अगले चुनावों के बाद भी सत्ता में बने रहते हैं, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए क्या संकेत होगा. उनका कहना था कि किसी नेता का लंबे समय तक सत्ता में बने रहना अपने आप में उपलब्धि नहीं माना जा सकता. असली प्रश्न यह है कि उस अवधि में जनता की स्वतंत्रता, संस्थाओं की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थिति क्या रही.

बातचीत का एक बड़ा हिस्सा भारतीय राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण पर केंद्रित रहा. श्रवण गर्ग ने कहा कि पिछले एक दशक में देश में उत्तर और दक्षिण, हिंदू और मुस्लिम, अगड़े और पिछड़े जैसे विभाजनों की राजनीति अधिक तीखी हुई है. उनके अनुसार लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका और स्वतंत्रता को लेकर भी पहले की तुलना में अधिक सवाल उठे हैं. इस संदर्भ में उन्होंने न्यायपालिका, चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर भी चिंता व्यक्त की.

चर्चा केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रही. विदेश नीति पर बात करते हुए श्रवण गर्ग ने हाल की उस घटना का उल्लेख किया जिसमें अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर हुए हमलों में भारतीय नागरिकों की मौत हुई. उन्होंने सवाल उठाया कि जब भारत स्वयं को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, तब ऐसी घटनाओं पर उसकी प्रतिक्रिया कितनी प्रभावी और मुखर रही है. उनके अनुसार किसी भी सरकार की विदेश नीति का मूल्यांकन केवल विदेश दौरों और कूटनीतिक तस्वीरों से नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में अपने नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा करने की क्षमता से किया जाना चाहिए.

बातचीत में अमेरिका के साथ भारत के संबंधों का भी उल्लेख हुआ. श्रवण गर्ग का कहना था कि दुनिया के कई छोटे देश भी अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सम्मान के प्रश्नों पर खुलकर अपनी बात रखते हैं. ऐसे में भारत जैसे बड़े देश से अपेक्षा और भी अधिक होती है. उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या भारत की विदेश नीति वास्तव में उतनी आत्मविश्वासी और स्वतंत्र है, जितनी उसका राजनीतिक प्रचार प्रस्तुत करता है.

प्रधानमंत्री के 12 वर्षों के मूल्यांकन को लेकर श्रवण गर्ग ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया. उन्होंने कहा कि यदि सरकार अपनी उपलब्धियों का दावा करती है, तो यह भी बताया जाना चाहिए कि आर्थिक विकास, रोजगार, लोकतंत्र, नागरिक समृद्धि, रुपये की स्थिति, विदेश नीति और नागरिकों के जीवन स्तर जैसे क्षेत्रों में वास्तविक उपलब्धियां क्या रही हैं. उनके अनुसार किसी भी सरकार का मूल्यांकन प्रचार से नहीं, बल्कि नागरिकों के अनुभवों और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से होना चाहिए.

इस पूरी चर्चा का केंद्रीय निष्कर्ष यही था कि लोकतंत्र में किसी नेता के लंबे कार्यकाल का जश्न मनाना अलग बात है और उस कार्यकाल के प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन करना अलग. भाजपा नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों को ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, लेकिन लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का होता है. सवाल केवल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री ने कितने वर्ष सत्ता में बिताए, बल्कि यह है कि उन वर्षों में भारत की संस्थाएं, नागरिक अधिकार, सामाजिक एकता, आर्थिक अवसर और वैश्विक प्रतिष्ठा किस दिशा में आगे बढ़े. यही वे प्रश्न हैं जिनके आधार पर किसी भी राजनीतिक दौर का वास्तविक मूल्यांकन किया जाना चाहिए.पूरी पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं.

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