“लग रहा है कि घर में बेघर हो गए हम”: मतदान के लिए व्हीलचेयर तैयार रखी थी, लेकिन सूची से नाम ही हटा दिया
मोहम्मद रौनक परवेज़ ने मतदान के दिन के लिए एक व्हीलचेयर तैयार रखी थी. उनके तीन बेटों में से एक, सॉफ्टवेयर इंजीनियर मोहम्मद फहाद ने इसे तीन महीने पहले इसलिए खरीदा था, ताकि उनके बिस्तर पर पड़े पिता मतदान केंद्र तक पहुँच सकें. बुधवार की सुबह उस व्हीलचेयर की ज़रूरत नहीं पड़ी. मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान 56 वर्षीय दुकानदार का नाम हटा दिया गया था. उनके तीनों बेटों के नाम भी हटा दिए गए थे.
उत्तर 24 परगना के कमरहटी स्थित दासुबाबू बागान में अपने घर के भीतर, परिवार अपने दुख को संभालने की कोशिश कर रहा था, जबकि पड़ोसी वोट डालने के लिए बाहर निकल रहे थे.
परवेज़ ने आँखों में आँसू भरकर कहा, “लग रहा है कि घर में बेघर हो गए हम. मतदान का दिन एक उत्सव होता है—लोकतंत्र का उत्सव. हम एक परिवार के रूप में इसमें भाग लेते थे. इस बार हम सिर्फ गवाह हैं. और कुछ नहीं कर सकते हम. यह दर्द देता है.”
किंशुक बसु के अनुसार, कुछ महीने पहले, स्ट्रोक के कारण परवेज़ बिस्तर पर आ गए थे. तब से, वह फिर से चलने-फिरने की उम्मीद में फिजियोथेरेपी और दवाएं ले रहे हैं. कमरहटी के पुराने निवासी के रूप में, उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत की कि उनके बेटों को अच्छी शिक्षा मिले और वे उसी समावेशी समाज के हिस्से के रूप में बड़े हों जिसमें उनका परिवार विश्वास करता था.
उनकी मेहनत रंग भी लाई. सबसे बड़ा बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है. दूसरा, मोहम्मद फैजान रौनक, आलिया विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में बी.टेक कर रहा है. सबसे छोटा बेटा श्यामबाज़ार के महाराजा श्रीश चंद्र कॉलेज में स्नातक का छात्र है.
जहाँ परवेज़ का नाम हटा दिया गया, वहीं उनके दो भाइयों के नाम संशोधित सूची में मौजूद थे. फैजान ने कहा, "तकनीकी खराबी के कारण अंततः मेरे पिता का नाम शामिल नहीं हो सका. परिणामस्वरूप, हमारे नाम भी हटा दिए गए."
लकड़ी की एक छोटी खाट के इर्द-गिर्द इकट्ठा हुए भाइयों ने अपनी हताशा व्यक्त करते हुए अपने पिता को सहारा देकर बिठाया. फैजान ने कहा, “कोई स्पष्टता नहीं है. हम यहाँ पैदा हुए, इस शहर के संस्थानों में पढ़े, और यह विश्वास करते हुए बड़े हुए कि हमारे दस्तावेज़—पासपोर्ट और अन्य—हमारी पहचान स्थापित करते हैं. हमें अब भी नहीं पता कि हम वोट देने के योग्य क्यों नहीं थे. इन सवालों का जवाब कोई नहीं देता.”
ग्राहम रोड के पास संकरी गलियों में बनी छोटी इमारतों का समूह 'दासुबाबू बागान', कोलकाता से लगभग 13 किमी उत्तर में सागर दत्ता अस्पताल के पास स्थित है. बुधवार को बाहर जनजीवन सामान्य था. पुरुषों के समूह चर्चा में बैठे थे कि दूसरे चरण का मतदान कैसा रहा, जबकि अन्य बाज़ारों की ओर जा रहे थे. केंद्रीय बलों की वैन इलाके में घूम रही थी और पुलिस मतदान केंद्रों के पास पहरा दे रही थी.
फहाद ने कहा, “अगर हमें अपना पक्ष ठीक से रखने का समय मिलता, तो नाम नहीं कटते. सब कुछ बहुत जल्दबाज़ी में लगा. हमें समय दीजिए, हम समझा सकते हैं कि हम इस निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता क्यों हैं. लेकिन सुन कौन रहा है?”
कमरहटी, जो कभी बंद कारखानों और संघर्षरत मध्यम वर्ग वाला वामपंथ का गढ़ था, वहां 2011 में पहली बार राजनीतिक बदलाव देखा गया था जब तृणमूल के मदन मित्रा ने 24,000 से अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की थी. वह 2016 में हार गए और 2021 में फिर से सीट जीत ली.
लेकिन बुधवार को कई मोहल्लों में ध्यान इस बात पर नहीं था कि कौन जीतेगा, बल्कि इस पर था कि कौन वोट दे पाएगा. मद्रास लेन, मुस्लिम लेन, धोबिया बागान और अनवर बागान जैसे इलाकों में कई परिवारों को इसी तरह की हताशा का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए थे.
सबसे छोटे बेटे फरहान ने कहा, “मेरे दोस्त, जिनके साथ मैं अलग-अलग पारा (मोहल्लों) में बड़ा हुआ, उनके नाम सूची में नहीं हैं. वे सभी कोलकाता में पैदा हुए थे, लेकिन मतदाता के रूप में अर्हता प्राप्त करने के लिए उनके लिए इतना काफी नहीं था.”

