चोट के निशान, फटे लिगामेंट और न झुकने का संकल्प: संसद मार्च के बाद वापस लौटे छात्र

चंदन कुमार ने जवाब देने से पहले अपनी गर्दन के पिछले हिस्से को छुआ. चोट के निशान अभी भी ताज़ा थे. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के जंतर-मंतर स्थित धरना स्थल पर बैठे दिल्ली विश्वविद्यालय के इस स्नातकोत्तर (मास्टर्स) छात्र ने धीरे-धीरे हरकत की और हर कुछ वाक्यों के बाद रुके. "मुझे अभी भी दर्द हो रहा है," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा. "लेकिन दवा लेने के बाद, मुझे उम्मीद है कि मैं जल्द ठीक हो जाऊंगा."

चौबीस घंटे पहले, चंदन उन हज़ारों लोगों में शामिल थे जो सीजेपी के "चलो संसद" मार्च में हिस्सा लेने आए थे. यह केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और भारत की परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों की मांग को लेकर एक महीने से चल रहे विरोध प्रदर्शन को संसद तक ले जाने का एक प्रयास था. मार्च संसद तक नहीं पहुँच सका. इस आंदोलन में अब तक की सबसे बड़ी भीड़ जुटाने वाला यह मार्च मध्य दिल्ली में कुछ ही शुरुआती पुलिस बैरिकेड्स से आगे बढ़ पाया था कि इलाका घंटों तक झड़पों, लाठीचार्ज, आंसू गैस और भागती भीड़ के अखाड़े में बदल गया.

देबायन दत्ता ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि शाम तक, दिल्ली पुलिस ने कहा कि 118 से अधिक कर्मी घायल हुए हैं और लगभग 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है. विरोध प्रदर्शन के आयोजकों का दावा है कि बड़ी संख्या में छात्र भी घायल हुए हैं.

मंगलवार को, उनमें से कई वापस लौट आए थे. कुछ पट्टियों से ढके हाथों के

साथ बैठे थे. अन्य धरना स्थल पर लंगड़ा कर चल रहे थे. कुछ तिरपाल की चादरों के नीचे बिछाई गई गद्दों और बांस के खंभों का सहारा लिए हुए थे.  उनकी चोटें एक ऐसे आंदोलन की नई याद दिला रही थीं, जो एक इंटरनेट मीम से शुरू होकर हाल के वर्षों में राजधानी के सबसे लंबे समय तक चलने वाले छात्र विरोध प्रदर्शनों में से एक बन गया है.

चंदन के लिए, हिंसा अचानक शुरू हुई. उन्हें याद है कि उन्होंने बिना किसी

घटना के एक के बाद एक बैरिकेड पार किए थे. "तीसरे या चौथे बैरिकेड के बाद, उन्होंने हमें पीटना शुरू कर दिया," उन्होंने 'द टेलीग्राफ ऑनलाइन' को बताया. "वे अंधाधुंध मार रहे थे. पैरों, पीठ और गर्दन पर. मेरी पीठ और गर्दन पर चोटें आई हैं."

उनके आसपास, अन्य लोगों ने भी ऐसी ही कहानियां सुनाईं. रामजस कॉलेज के

छात्र राहुल ने बताया कि मार्च के दौरान उस इलाके में पहुँचने के बाद उन्हें और प्रदर्शनकारियों के एक समूह को संसद मार्ग के पास एलआईसी इमारत के अंदर धकेल दिया गया. "उन्होंने हमें अंदर धकेला और पीटा," उन्होंने बताया. "हमारे हाथ पूरी तरह लाल हो गए थे. हमारे कई साथी घायल हो गए थे."

दिल्ली पुलिस का रुख बरकरार है कि प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए, उन्होंने सुरक्षाकर्मियों पर पत्थरों से हमला किया, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और निषेधाज्ञा के बावजूद बार-बार बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की. पुलिस का कहना है कि उन्होंने बल प्रयोग तभी किया जब प्रदर्शनकारी आक्रामक हो गए.

हालांकि, छात्रों के लिए सोमवार का दिन इस बात से कम जुड़ा था कि

हिंसा किसने शुरू की, बल्कि इससे ज़्यादा जुड़ा था कि उसके बाद क्या हुआ. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की दिल्ली यूनिवर्सिटी सचिव अंजलि के पास अब वे चप्पलें नहीं थीं जो उन्होंने मार्च में पहनी थीं. केरल हाउस के पास मची भगदड़ जैसे हालात से बचने की कोशिश में उनकी चप्पलें छूट गईं.

"मुझे नंगे पैर लगभग 500 से 600 मीटर तक घसीटा गया," उन्होंने बताया.  डॉक्टरों ने लिगामेंट फटने का निदान किया है जिसे ठीक होने में हफ्ते लग सकते हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि मध्य दिल्ली में बैरिकेड्स की कई परतों से टकराने से पहले मार्च शांतिपूर्वक शुरू हुआ था. "जब लोग दोनों तरफ से फंस जाते हैं और उन पर लाठीचार्ज किया जाता है, तो वे क्या करेंगे?" उन्होंने

पूछा. "वे भागेंगे ही." घायल छात्रों से बातचीत में यह मंज़र बार-बार सामने आया. भागना. आंसू गैस से भागना. लाठियों से भागना. यह जाने बिना भागना कि अगला बैरिकेड कहाँ सामने आ जाएगा. 

दिल्ली विश्वविद्यालय की एक अन्य छात्रा तन्वी ने को बताया कि अंततः दोस्तों के साथ एलआईसी इमारत के पिछले निकास द्वार से निकलने से पहले वह कई बार भगदड़ जैसी स्थिति में फंस गई थी. उनकी दाहिनी बांह पर लाठी के वार के गहरे नीले निशान थे. उन्होंने बताया कि डॉक्टरों ने उन्हें मांसपेशियों में गंभीर चोट आने की बात कही है. उनकी पीठ और छाती पर अभी भी सूजन है. "मुझे अपनी आंखों देखे पर यकीन नहीं हो रहा था," उन्होंने कहा. "लोग खून से लथपथ थे. लोग रो रहे थे. वहाँ महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग थे. हम शांतिपूर्वक आए थे." फिर भी किसी ने वापस जाने (आंदोलन छोड़ने) की बात नहीं की.

चोटों के बावजूद क्या वह प्रदर्शन में वापस लौटेंगी, यह पूछे जाने पर तन्वी बिना हिचकिचाए बोलीं, "बिल्कुल." "हम सालों से गुस्से में हैं," उन्होंने

कहा. "देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र अभी भी आ रहे हैं. आज भी जंतर-मंतर खचाखच भरा हुआ है. हम पीछे हटने वाले नहीं हैं." यह भावना पूरे धरना स्थल पर गूंज रही थी.

कुछ छात्र अपनी चोटों के निशानों की तुलना कर रहे थे. स्वयंसेवक दर्द निवारक दवाएं बांट रहे थे. बातचीत मेडिकल रिपोर्टों और कल की योजनाओं के बीच घूम रही थी. अस्पताल से भूख हड़ताल जारी रखने वाले सोनम वांगचुक की खबरें तंबुओं में तेजी से फैल रही थीं.

पिछले एक महीने में यह विरोध प्रदर्शन बदल गया है. इसने पूरे भारत से अभिनेताओं, राजनेताओं, सेवानिवृत्त नौकरशाहों और हजारों समर्थकों को आकर्षित किया है. लेकिन इसके केंद्र में अभी भी चंदन, राहुल, अंजलि और तन्वी जैसे छात्र ही हैं. उनकी चोटें साफ दिख रही हैं. उनका संकल्प भी उतना ही साफ है. चोटों ने भले ही उनकी रफ्तार धीमी कर दी हो, लेकिन वे उन्हें घर वापस नहीं भेज पाई हैं.

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