मीम से आंदोलन तक: युवाओं की नई भाषा ने सत्ता को क्यों डराया? #harkara

कड़वी कॉफी के इस एपिसोड में पंकज कुमार के साथ प्रोफेसर अपूर्वानंद और पत्रकार-संपादक निधीश त्यागी ने युवाओं के हालिया जनउभार पर विस्तार से चर्चा की है. यह चर्चा सिर्फ नीट या प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, रोजगार, लोकतंत्र, सत्ता, मीडिया और नई पीढ़ी के बदलते राजनीतिक तेवरों तक जाती है. जंतर-मंतर पर युवाओं की नई भाषा, मीम और व्यंग्य से लेकर उनके पोस्टर्स, नारों और सरकार के प्रति बढ़ते आक्रोश तक, इस पूरे घटनाक्रम को समझने की कोशिश की गई है. चर्चा में 1974 के छात्र आंदोलन, अन्ना आंदोलन, किसान आंदोलन और शाहीन बाग जैसे आंदोलनों के अनुभवों के साथ मौजूदा जनउभार की तुलना भी की गई है. सवाल यह भी है कि क्या आज की युवा पीढ़ी के सामने शिक्षा और रोजगार के रास्ते लगातार संकरे होते जा रहे हैं? क्या प्रतियोगी परीक्षाओं की समस्या वास्तव में शिक्षा और अर्थव्यवस्था के बड़े संकट का हिस्सा है? पिछले 12 वर्षों में सत्ता के प्रति प्रेम से संदेह, भय और फिर आक्रोश तक का सफर कैसे हुआ? और क्या जंतर-मंतर ने अलग-अलग धर्म, वर्ग और पीढ़ियों को एक साझा मुद्दे पर फिर से जोड़ा है? चर्चा के एक अहम हिस्से में मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं. पारंपरिक मीडिया से बढ़ते अविश्वास और मोबाइल, सोशल मीडिया तथा छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए सामने आती वैकल्पिक आवाजों पर भी बात हुई है.

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