अपूर्वानंद | 12वीं कक्षा के बच्चों ने हमें आंख में उंगली डालकर दिखलाया कि यह व्यवस्था कितनी त्रुटिपूर्ण है

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस संवाद में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और प्रोफेसर अपूर्वानंद ने सीबीएसई की 12वीं बोर्ड परीक्षा के मूल्यांकन विवाद, डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली की खामियों और भारत की परीक्षा-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर चर्चा की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से हुई कि देश की सबसे महत्वपूर्ण स्कूली परीक्षा मानी जाने वाली 12वीं बोर्ड परीक्षा में सामने आई गड़बड़ियां केवल तकनीकी समस्या हैं या फिर पूरे शिक्षा तंत्र की गहरी संस्थागत विफलता का संकेत.

प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि सीबीएसई केवल एक परीक्षा बोर्ड नहीं, बल्कि भारत की स्कूली शिक्षा का सबसे प्रभावशाली संस्थान है. ऐसे में उसकी किसी भी चूक का असर लाखों छात्रों और पूरे शिक्षा तंत्र पर पड़ता है. उन्होंने याद दिलाया कि भारत की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह परीक्षा-केंद्रित है, जहां पढ़ाई का स्वरूप भी परीक्षाओं के अनुसार तय होता है. इसलिए 12वीं बोर्ड परीक्षा में पारदर्शिता और विश्वसनीयता केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आवश्यकता भी है.

चर्चा का केंद्र सीबीएसई द्वारा लागू की गई ऑनलाइन मूल्यांकन प्रणाली रही. अपूर्वानंद ने सवाल उठाया कि आखिर पारंपरिक मूल्यांकन पद्धति में ऐसी कौन-सी कमी थी, जिसके कारण बिना व्यापक तैयारी और पर्याप्त परीक्षण के नई व्यवस्था लागू कर दी गई. उनका तर्क था कि देश के अनेक हिस्सों में इंटरनेट और तकनीकी ढांचे की सीमाओं के बावजूद लाखों छात्रों के भविष्य को एक ऐसी प्रणाली के भरोसे छोड़ दिया गया, जिसकी विश्वसनीयता पहले से विवादों में रही है.

संवाद में उस निजी कंपनी की भूमिका पर भी सवाल उठे, जिसे मूल्यांकन प्रक्रिया का जिम्मा दिया गया. चर्चा के दौरान दावा किया गया कि इस कंपनी का रिकॉर्ड पहले भी विवादित रहा है और अन्य राज्यों में तकनीकी गड़बड़ियों के आरोप सामने आ चुके हैं. इसके बावजूद उसे जिम्मेदारी सौंपने और सुरक्षा संबंधी कई शर्तों में ढील देने पर सवाल उठाए गए.

बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन छात्रों की भूमिका पर केंद्रित रहा, जिन्होंने सोशल मीडिया के जरिए मूल्यांकन की गड़बड़ियों को सार्वजनिक किया. प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि यदि कुछ छात्रों ने स्वयं आगे बढ़कर विसंगतियां उजागर नहीं की होतीं, तो संभव है कि यह पूरा मामला दबा रह जाता. उन्होंने इसे युवाओं की सजगता का उदाहरण बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि संस्थानों की जिम्मेदारी छात्रों पर नहीं डाली जा सकती.

संवाद में मीडिया, स्कूल प्रशासन और सरकारी संस्थाओं की भूमिका पर भी आलोचनात्मक सवाल उठे. चर्चा में कहा गया कि छात्रों की शिकायतों की गंभीर जांच करने के बजाय कई संस्थाएं नई व्यवस्था का बचाव करती नजर आईं. इससे यह चिंता भी सामने आई कि क्या शिक्षा संस्थान छात्रों के हितों की रक्षा करने के बजाय सत्ता और प्रशासनिक संरचनाओं के प्रति अधिक जवाबदेह होते जा रहे हैं.

अपूर्वानंद ने कहा कि भारत में बच्चों को बहुत कम उम्र से ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की मशीन में बदल दिया जाता है. छठी-सातवीं कक्षा से शुरू होने वाली कोचिंग संस्कृति, लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा और परीक्षा का दबाव युवाओं के जीवन को निर्धारित करने लगा है. उनके अनुसार, परीक्षा अब शिक्षा का साधन नहीं बल्कि शिक्षा का उद्देश्य बन गई है.

संवाद के अंत में चर्चा केवल सीबीएसई विवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसे के संकट तक पहुंची. अपूर्वानंद ने कहा कि जब पुलिस, जांच एजेंसियों, शैक्षणिक संस्थानों और परीक्षा निकायों की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें, तो समस्या केवल एक परीक्षा की नहीं रह जाती. यह उस भरोसे का संकट बन जाती है, जिस पर लोकतांत्रिक समाज खड़ा होता है. पूरी बातचीत यहाँ देखी जा सकती है.

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