श्रवण गर्ग | क्या सीजेआई द्वारा की गई एक टिप्पणी, 140 करोड़ के देश में किसी बड़े आंदोलन का ट्रिगर बन सकती है?
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस विस्तृत इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी ने हाल के दिनों में अचानक चर्चा में आई तथाकथित “भारतीय कॉकरोच पार्टी” या “कॉकरोच जनता पार्टी” को लेकर गहरी राजनीतिक और सामाजिक पड़ताल की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से हुई कि आखिर कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स जुटाने वाला यह प्रयोग वास्तव में युवाओं की स्वतःस्फूर्त राजनीतिक बेचैनी है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक, वैचारिक या अंतरराष्ट्रीय खेल काम कर रहा है.
निधीश त्यागी ने कहा कि सरकार इस पूरे घटनाक्रम से असहज और आहत दिखाई दे रही है. पार्टी का सोशल मीडिया हैंडल ब्लॉक किए जाने, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और कथित संस्थापक अभिजीत दीपके के खिलाफ शुरू हुए “स्मियर कैंपेन” का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अब यह मामला केवल सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं रह गया, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन चुका है. उनके अनुसार देखते ही देखते करोड़ों लोग इस डिजिटल अभियान से जुड़ने लगे और यह सवाल उठने लगा कि आखिर यह ऊर्जा कहां से आ रही है.
श्रवण गर्ग ने इस पूरे घटनाक्रम की जड़ 15 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश की उस टिप्पणी को बताया, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश में “कॉकरोचों की तरह युवा” हैं जिन्हें रोजगार नहीं मिलता और जो बाद में मीडिया, सोशल मीडिया या एक्टिविज्म की ओर चले जाते हैं. गर्ग ने कहा कि बाद में इस टिप्पणी पर विवाद बढ़ने के बाद सफाई दी गई, लेकिन संभव है कि यही टिप्पणी एक बड़े डिजिटल-राजनीतिक आंदोलन का “ट्रिगर” बन गई हो.
श्रवण गर्ग ने 1974 के जेपी आंदोलन, गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन, अरब स्प्रिंग और 2011 के अन्ना आंदोलन का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि हर बड़े आंदोलन के पीछे कोई स्पष्ट कारण, संगठन और जमीन पर संघर्ष होता था. गुजरात में छात्र आंदोलनों से लेकर बिहार छात्र संघर्ष समिति तक हर जगह कोई ठोस सामाजिक और राजनीतिक कारण मौजूद था. लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या अमेरिका में बैठे एक छात्र द्वारा बनाए गए मीम्स और सोशल मीडिया अभियान से सचमुच भारत जैसे देश में राजनीतिक क्रांति पैदा हो सकती है.
बातचीत में अभिजीत दीपके की भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा हुई. बताया गया कि वह पुणे से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद अमेरिका की बॉस्टन यूनिवर्सिटी गए थे. उनके बारे में सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें फैलाई जा रही हैं, जैसे उन्हें यूनिवर्सिटी से निकाला गया या वे दलित पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन इनमें से कई दावों की पुष्टि नहीं हुई है. श्रवण गर्ग ने कहा कि इतने कम समय में 20 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स जुटा लेना अपने आप में संदेह पैदा करता है. उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार राजू पारुलेकर के उस सवाल का भी उल्लेख किया जिसमें पूछा गया था कि क्या तकनीकी रूप से इतने कम समय में इतने वास्तविक फॉलोअर्स जुटाना संभव भी है.
इंटरव्यू में यह भी चर्चा हुई कि कॉकरोच जनता पार्टी खुद को “ऑफ द यूथ, बाय द यूथ, फॉर द यूथ” बताती है. पार्टी का दावा है कि वह बेरोजगार और व्यवस्था से निराश युवाओं की आवाज है. लेकिन श्रवण गर्ग ने पूछा कि अगर यह आंदोलन सचमुच बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और व्यवस्था विरोध की राजनीति कर रहा है, तो यह विपक्षी दलों या राहुल गांधी जैसे नेताओं के साथ क्यों नहीं खड़ा होता, जो लंबे समय से इन्हीं मुद्दों को उठा रहे हैं.
बातचीत में यह आशंका भी जताई गई कि कहीं यह प्रयोग विपक्ष, खासकर राहुल गांधी के समर्थन आधार को कमजोर करने की कोशिश तो नहीं. श्रवण गर्ग ने कहा कि 1974 के जेपी आंदोलन और 2011 के अन्ना आंदोलन को अंततः आरएसएस और बीजेपी ने राजनीतिक रूप से अपने पक्ष में इस्तेमाल किया था. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह नया डिजिटल आंदोलन भी किसी बड़े राजनीतिक उद्देश्य के लिए तैयार किया गया है.
बातचीत के दौरान आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल का नाम भी सामने आया. अभिजीत दीपके की मनीष सिसोदिया के साथ तस्वीरों और पुराने बयानों का जिक्र करते हुए यह सवाल पूछा गया कि क्या यह आम आदमी पार्टी की किसी नई राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है. हालांकि इस पर कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया, लेकिन श्रवण गर्ग ने कहा कि राजनीति में “बेनामी फैक्ट्रियों” की तरह नए प्रयोग खड़े किए जाना असंभव नहीं है.
श्रवण गर्ग ने इस बात पर जोर दिया कि राजनीति केवल वायरल मीम्स और डिजिटल फॉलोइंग से नहीं चलती. उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संघर्षों में वर्षों की मेहनत, संगठन, विचारधारा और बलिदान लगते हैं. उनके अनुसार किसी 30 वर्षीय युवक का अमेरिका में बैठकर अचानक पार्टी बनाना और लाखों फॉलोअर्स जुटा लेना लोकतांत्रिक राजनीति की गंभीरता को चुनौती देता है. उन्होंने इसे भारतीय लोकतंत्र को “अंडरमाइन” करने वाली प्रवृत्ति तक बताया.
इंटरव्यू के अंतिम हिस्से में श्रवण गर्ग ने इस पूरे घटनाक्रम को “कांस्पिरेसी” यानी साजिश की नजर से देखने की बात कही. उन्होंने कहा कि यह स्थापित राजनीतिक व्यवस्था, विपक्ष और लोकतांत्रिक प्रक्रिया — तीनों को एक साथ कमजोर करने वाला प्रयोग भी हो सकता है. वहीं निधीश त्यागी ने कहा कि इस नई पार्टी या अभियान को जनता के सामने पारदर्शिता से बताना चाहिए कि उसका एजेंडा क्या है, उसके पीछे कौन लोग हैं और वह भारतीय राजनीति में क्या बदलाव लाना चाहता है. पूरी वीडियो यहाँ देखी जा सकती है.

