श्रवण गर्ग | प्रधानमंत्री ब्रिक्स के जरिए अपनी इमेज का मेकओवर करना चाहते थे
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, भारत की विदेश नीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक भूमिका पर चर्चा हुई. बातचीत का केंद्रीय सवाल यह रहा कि ब्रिक्स से भारत को आखिर क्या हासिल हुआ और क्या भारत इस मंच के जरिए ग्लोबल साउथ में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका स्थापित कर पाया.
श्रवण गर्ग ने कहा कि ब्रिक्स को लेकर भारत में ऐसी कोई व्यापक सार्वजनिक चर्चा दिखाई नहीं देती, जिससे नागरिक यह समझ सकें कि संगठन का उद्देश्य क्या है और भारत के लिए इसकी वास्तविक उपयोगिता क्या है. उनके मुताबिक, सम्मेलन का राजनीतिक और कूटनीतिक प्रदर्शन तो हुआ, लेकिन इसके ठोस परिणामों को लेकर सवाल अब भी बने हुए हैं.
चर्चा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बॉडी लैंग्वेज और सम्मेलन में उनकी भूमिका पर भी बात हुई. श्रवण गर्ग के अनुसार, मोदी एक परिपक्व और आक्रामक वैश्विक नेता की छवि पेश करते दिखाई दिए. हालांकि, उनके भाषण में क्रिटिकल मिनरल्स और सप्लाई चेन को हथियार बनाने के खिलाफ दिया गया संदेश अप्रत्यक्ष रूप से चीन पर भी सवाल खड़े करता दिखा, जबकि भारत अमेरिका के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को भी बनाए रखना चाहता है.
भारत के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों को लेकर श्रवण गर्ग ने कहा कि ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार बढ़ाने की बात सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन भारत के अधिकांश प्रमुख ब्रिक्स साझेदारों के साथ व्यापार घाटे में है. दूसरी ओर, अमेरिका भारत के निर्यात, सॉफ्टवेयर कारोबार, निवेश और रेमिटेंस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. ऐसे में भारत के लिए अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधना लगातार कठिन होता जा रहा है.
डी-डॉलराइजेशन, पश्चिम एशिया, ईरान-इजराइल संघर्ष और फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी भारत के रुख को लेकर सवाल उठे. श्रवण गर्ग के मुताबिक, ब्रिक्स से यह उम्मीद थी कि वह डॉलर के वर्चस्व और पश्चिम एशिया के संकट जैसे मुद्दों पर कोई स्पष्ट सामूहिक दिशा देगा, लेकिन घोषणा-पत्र में भारत की ओर से अपेक्षाकृत सीमित रुख दिखाई दिया.
पहलगाम हमले और क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म के उल्लेख को लेकर भी चर्चा हुई. सवाल यह था कि घोषणा-पत्र में किसी मुद्दे का उल्लेख अपने आप में कितना प्रभावी है और क्या इससे वास्तव में चीन-पाकिस्तान संबंधों में कोई बदलाव आएगा.
अंत में चर्चा प्रधानमंत्री की घरेलू राजनीतिक छवि तक पहुंची. श्रवण गर्ग ने कहा कि ब्रिक्स के जरिए मोदी अपनी ग्लोबल साउथ लीडर वाली छवि को मजबूत करना चाहते थे, लेकिन सम्मेलन के बाद बीजेपी के भीतर अपेक्षित उत्साह दिखाई नहीं देता. उनके मुताबिक, ब्रिक्स में भारत की मौजूदगी जरूर रही, लेकिन उसकी नेतृत्वकारी भूमिका उतनी स्पष्ट नहीं दिखी.
पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

