श्रवण गर्ग | मोदी जी अगर सिस्टम में आए और बने हुए हैं तो उसका एक बड़ा कारण कांग्रेस में उनके स्लीपर सेल्स हैं.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ विपक्ष की राजनीति, इंडिया गठबंधन के भविष्य और राहुल गांधी की नई राजनीतिक रणनीति पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत श्रवण गर्ग के उस ब्लॉग से होती है जिसमें उन्होंने राहुल गांधी के हालिया भाषण को विपक्षी राजनीति में एक निर्णायक मोड़ बताया है.
उनके मुताबिक राहुल गांधी अब उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं जहां उन्हें यह तय करना है कि कांग्रेस को बचाना है, लोकतंत्र और संविधान की लड़ाई लड़नी है या फिर उन सहयोगी दलों को संभालने में अपनी ऊर्जा खर्च करनी है जो खुद अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं.
श्रवण गर्ग ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल के नतीजों ने केवल एक चुनाव का परिणाम नहीं दिया, बल्कि पूरे विपक्ष की वास्तविक स्थिति सामने ला दी है. उनके मुताबिक समाजवादी पार्टी, एनसीपी, शिवसेना और अन्य क्षेत्रीय दल अपने-अपने संकटों से घिरे हुए हैं और ऐसे में कांग्रेस को अब अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी.
श्रवण गर्ग का कहना है कि राहुल गांधी के हालिया भाषण को केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उनके अनुसार राहुल ने साफ संकेत दिया है कि अगर सहयोगी दल संघर्ष के नए तरीके अपनाने को तैयार नहीं हैं, तो कांग्रेस अकेले आगे बढ़ेगी. उनका मानना है कि राहुल अब सहयोगी दलों को बचाने के बजाय कांग्रेस, लोकतंत्र और संविधान की लड़ाई को प्राथमिकता दे रहे हैं.
चर्चा में श्रवण गर्ग ने तर्क दिया कि अधिकांश क्षेत्रीय दल परिवारवाद पर आधारित हैं और इसलिए वे वैचारिक या संगठनात्मक बदलाव नहीं कर सकते. इसके उलट कांग्रेस तमाम कमजोरियों के बावजूद एक राष्ट्रीय संगठन है, जो खुद को बदलने की क्षमता रखता है. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पार्टी के भीतर बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं और आने वाले समय में यह और स्पष्ट दिखाई देगा.
श्रवण गर्ग के अनुसार मौजूदा संघर्ष केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच चुनावी मुकाबला नहीं है. उनका कहना है कि संघ ने दशकों तक संस्थानों और सामाजिक ढांचे में अपनी पकड़ मजबूत करने का काम किया है, जबकि कांग्रेस इस मोर्चे पर पीछे रह गई. यही वजह है कि राहुल गांधी बार-बार संस्थाओं, संविधान और लोकतांत्रिक ढांचे पर खतरे की बात करते हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी दलों के विलय या बड़े राजनीतिक पुनर्गठन की चर्चाएं व्यावहारिक नहीं दिखतीं. अधिकांश दल अपने पारिवारिक और क्षेत्रीय हितों से बंधे हुए हैं. ऐसे में कांग्रेस को अपनी राजनीतिक लड़ाई अपने दम पर आगे बढ़ानी पड़ सकती है.पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं.

