‘हम बनाम वे’ की मानसिकता से पैदा होती है हेट स्पीच; कानूनों का खराब प्रवर्तन ‘हेट क्राइम्स’ की वजह: सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (29 अप्रैल, 2026) को कहा कि नफरत भरे भाषण (हेट स्पीच) और अफवाह फैलाना “हम बनाम वे” की मानसिकता से उपजा है और यह एक विविध समाज में भाईचारे की भावना को दूषित करने का काम करता है. हालांकि, अदालत ने नफरत भरे भाषणों और अपराधों के खिलाफ विशिष्ट कानून बनाने का निर्देश देने से इनकार कर दिया, इसके बजाय इस अपराध को कवर करने वाले मौजूदा कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने का आव्हान किया.

कृष्णदास राजगोपाल की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 125 पन्नों के फैसले में टिप्पणी की, “नफरत भरा भाषण, अपने मूल में, अंतर की उस धारणा से पैदा होता है जो बहिष्कार को जन्म देती है, जहाँ ‘दूसरे’ को विदेशी, निम्न या समान सम्मान के अयोग्य माना जाता है.” न्यायमूर्ति नाथ ने आगाह किया कि जब तक “हम” और “वे” का यह द्वंद्व बना रहेगा, तब तक भाईचारे का वादा अधूरा रहेगा और सच्ची संवैधानिक आत्मीयता मायावी साबित होगी.

शीर्ष अदालत ने कहा, “नफरत भरा भाषण केवल स्वीकार्य विमर्श से विचलन नहीं है; यह मौलिक रूप से भाईचारे के संवैधानिक मूल्य के विपरीत है और हमारे गणतंत्र के नैतिक ताने-बाने पर प्रहार करता है. यह भारत के गहरे सभ्यतागत लोकाचार के भी प्रतिकूल है... इस लोकाचार का दार्शनिक आधार ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के प्राचीन सूत्र में अभिव्यक्ति पाता है, जिसका विचार है कि पूरी दुनिया एक परिवार है.”

अदालत ने नफरत भरे भाषण के अभिशाप से निपटने के लिए किसी भी विशिष्ट कानून को लाने का विचार केंद्र सरकार और विधायी अधिकारियों पर छोड़ दिया.

न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, “हालांकि हम मांगी गई प्रकृति के निर्देश जारी करने से इनकार करते हैं, लेकिन हम यह गौर करना उचित समझते हैं कि ‘नफरत भरे भाषण’ और ‘अफवाह फैलाने’ से जुड़े मुद्दे सीधे तौर पर भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षण से जुड़े हैं.”

अदालत कानून नहीं बना सकती

फैसले में कहा गया कि अदालत विशेष विधायी कार्यक्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकती और न ही नफरत भरे भाषण के खिलाफ कानून बना सकती है. न्यायमूर्ति नाथ ने तर्क दिया, “न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका मुख्य रूप से कानून की व्याख्या और उसे लागू करने की है, न कि कानून बनाने की... अदालतों द्वारा विस्तृत वैधानिक योजनाएं निर्धारित करने या कानून के समान प्रावधान तैयार करने का कोई भी प्रयास ‘न्यायिक कानून-निर्माण’ कहलाएगा और यह विधायिका को सौंपे गए कार्यों में अनुचित हस्तक्षेप होगा.”

बेहतर प्रवर्तन ही समाधान

अदालत ने कहा कि नफरत भरे अपराधों (हेट क्राइम्स) के कारण खून-खराबा जारी रहने की वजह मौजूदा कानूनों का खराब प्रवर्तन (लागू करना) है, न कि इस मुद्दे से निपटने या दोषियों को दंडित करने के लिए कानूनों की कमी.

अदालत ने कहा, “यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि कानून मौन है या सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने या अंतर-समूह शत्रुता को बढ़ावा देने वाले आचरण से उत्पन्न शिकायतों के समाधान में अपर्याप्त है. कमी कानून की अनुपस्थिति में नहीं, बल्कि विशिष्ट मामलों में इसके प्रयोग और प्रवर्तन में है. इस अदालत का कार्य नए अपराध बनाना या समानांतर नियामक व्यवस्थाएं बनाना नहीं है, बल्कि कानून के तहत पहले से परिकल्पित उपायों का निष्ठापूर्वक कार्यान्वयन सुनिश्चित करना है. “

अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के उन प्रावधानों की ओर इशारा किया जो पहले से ही नफरत भरे अपराधों को कवर करते हैं, जैसे: धारा 196: शत्रुता को बढ़ावा देना, धारा 197(1): राष्ट्रीय अखंडता के प्रतिकूल कार्य, धारा 299: धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना, धारा 302: धार्मिक भावनाओं को आहत करना, धारा 356: शत्रुता या शरारत को बढ़ावा देना.

अदालत ने यह भी नोट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 173(4) शिकायतकर्ता को यह अनुमति देती है कि यदि स्थानीय पुलिस स्टेशन संज्ञेय अपराध दर्ज करने से इनकार करता है, तो वह लिखित जानकारी डाक के माध्यम से पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है.

‘पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं’

न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि मूल दंडात्मक कानून (बीएनएस) और प्रक्रियात्मक कानून (बीएनएसएस) दोनों की वैधानिक संरचना इस तरह से बनाई गई है कि क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट की निगरानी में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जा सके. अदालत ने कहा कि यह कानून प्रवर्तन अधिकारियों (पुलिस) पर निर्भर है कि वे मौजूदा कानूनों का निष्ठापूर्वक और निष्पक्ष कार्यान्वयन सुनिश्चित करें.

अदालत ने आगे कहा कि नफरत भरे भाषण की शिकायत पर संज्ञान लेने के लिए मजिस्ट्रेट को पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है. अदालत ने अपने पिछले फैसलों, विशेष रूप से 2018 के तहसीन पूनावाला मामले को दोहराते हुए कहा कि नफरत भरे भाषण की शिकायत मिलने पर पुलिस अधिकारियों को तुरंत प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए.

यह फैसला पत्रकार कुर्बान अली द्वारा दायर याचिका सहित कई याचिकाओं पर आया, जिसमें नफरत भरे भाषण और अपराधों के लिए अलग कानून बनाने की मांग की गई थी. याचिकाओं में इस बात पर भी जोर दिया गया था कि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के फैसलों के बावजूद समाज में नफरत भरे भाषणों की मौजूदगी बेरोकटोक बनी हुई है.

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