आकर पटेल | धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा शिक्षा व्यवस्था का समाधान नहीं, लेकिन जवाबदेही का प्रतीक जरूर होगा.

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में हरकारा के संपादक निधीश त्यागी ने लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल के साथ जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच पार्टी के आंदोलन, सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही के सवाल पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र यह रहा कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध अब भी सत्ता को जवाब देने के लिए मजबूर कर सकता है.

चर्चा की शुरुआत जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन से होती है, जहां छात्र और युवा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. आकार पटेल का कहना है कि सरकार स्वयं मान चुकी है कि परीक्षा प्रणाली में गंभीर खामियां हैं. नीट परीक्षा दोबारा कराना, प्रश्नपत्रों को एयरफोर्स के माध्यम से भेजना और सुरक्षा व्यवस्था बदलना इस बात का संकेत है कि व्यवस्था में समस्या थी. लेकिन इसके बावजूद किसी स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की गई. उनके अनुसार असली सवाल केवल परीक्षा में गड़बड़ी का नहीं, बल्कि यह है कि गलती स्वीकार करने के बाद भी जिम्मेदारी कौन लेगा.

बातचीत में यह भी कहा गया कि किसी मंत्री का इस्तीफा शिक्षा व्यवस्था की सभी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, लेकिन लोकतंत्र में यह जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण प्रतीक होता है. यदि सरकार हर उपलब्धि का श्रेय शीर्ष नेतृत्व को देती है, तो विफलताओं की जिम्मेदारी से भी बच नहीं सकती. यही कारण है कि आंदोलन केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि जवाबदेही की संस्कृति की मांग बन गया है.

भूख हड़ताल को लेकर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई. आकार पटेल का मानना है कि अहिंसक प्रतिरोध लोकतांत्रिक समाज में पूरी तरह वैध माध्यम है, क्योंकि इसमें किसी दूसरे को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता. उन्होंने गांधी के आंदोलनों का संदर्भ देते हुए कहा कि ऐसे विरोध तभी प्रभावी होते हैं जब जनता को उनकी जानकारी हो और समाज का एक बड़ा हिस्सा आंदोलन की मांगों को न्यायसंगत मानता हो. उनके अनुसार परीक्षा घोटालों का असर लगभग हर परिवार तक पहुंचता है, इसलिए यह मुद्दा व्यापक जनसमर्थन जुटाने की क्षमता रखता है.

चर्चा में किसान आंदोलन, शाहीन बाग और अन्य जन आंदोलनों का भी उल्लेख हुआ. तर्क दिया गया कि सरकारें अक्सर लंबे समय तक दबाव झेलने के बाद ही पीछे हटती हैं. आंदोलन की सफलता केवल मांग पूरी होने से नहीं, बल्कि सत्ता पर लगातार बने रहने वाले नैतिक और राजनीतिक दबाव से भी तय होती है.

एक महत्वपूर्ण पहलू पहली बार मतदान करने वाले युवाओं को लेकर सामने आया. इस आंदोलन में शामिल बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की है जो जल्द ही मतदाता बनेंगे. उनके लिए परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, अवसरों की समानता और सरकारी जवाबदेही सीधे उनके भविष्य से जुड़ा सवाल है. इसलिए यह आंदोलन केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाले समय की राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है.

बातचीत में विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठे. कहा गया कि राजनीतिक दलों का दायित्व जनता के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाना है, लेकिन शिक्षा संकट जैसे बड़े मुद्दे पर अपेक्षित सक्रियता दिखाई नहीं देती. साथ ही यह भी माना गया कि किसी भी जन आंदोलन को अपनी स्वतंत्रता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों से संतुलित दूरी और सहयोग, दोनों की जरूरत पड़ सकती है.

अंत में आकार पटेल ने कहा कि यह संघर्ष किसी एक परीक्षा या एक घटना तक सीमित नहीं है. जब तक सरकार यह भरोसा नहीं दिला पाती कि परीक्षा प्रणाली निष्पक्ष और सुरक्षित है तथा गड़बड़ियों पर जवाबदेही तय होगी, तब तक यह असंतोष बना रहेगा. उनके अनुसार यह आंदोलन उस पीढ़ी का संघर्ष है जो आज परीक्षा दे रही है और कल लोकतंत्र में अपने वोट के जरिए सत्ता से जवाब मांगने वाली है.पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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