श्रवण गर्ग | जीडीपी की खुशी सिर्फ प्रधानमंत्री के चेहरे पर है, देश के चेहरे पर नहीं है
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने भारत की 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर को लेकर उठे सवालों पर विस्तार से चर्चा की. सरकार ने अप्रैल-जून तिमाही में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत बताई है, लेकिन पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने इस आंकड़े पर सवाल उठाते हुए वास्तविक वृद्धि दर करीब 2.6 प्रतिशत होने का दावा किया है.
विवाद की मुख्य वजह जीडीपी की गणना के लिए इस्तेमाल किए गए आधार वर्ष और पुराने आंकड़ों में किया गया संशोधन है. सुभाष गर्ग का कहना है कि पिछले वर्ष की जीडीपी के आंकड़े को 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर करीब 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया. इसके बाद मौजूदा वर्ष के आंकड़े से तुलना करने पर वृद्धि दर काफी अधिक दिखाई देने लगी. उनका सवाल है कि यदि पिछले वर्ष का आंकड़ा नहीं बदला जाता, तो वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत के बजाय लगभग 2.6 प्रतिशत होती.
श्रवण गर्ग ने चर्चा में कहा कि जीडीपी के आंकड़ों की वास्तविकता को केवल सरकारी दावों से नहीं समझा जा सकता. उनके अनुसार, आर्थिक वृद्धि का असर रोजगार, निवेश, मजदूरी, बाजार और आम नागरिकों की जिंदगी में दिखाई देना चाहिए. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि देश की अर्थव्यवस्था इतनी तेज गति से बढ़ रही है, तो आम लोगों की आय, रोजगार और जीवन स्तर में उसी अनुपात में सुधार क्यों नहीं दिख रहा है.
उन्होंने कहा, “जीडीपी की खुशी सिर्फ प्रधानमंत्री के चेहरे पर है, देश के चेहरे पर नहीं है.” श्रवण गर्ग के मुताबिक, आंकड़ों की बाजीगरी से नागरिकों का विश्वास हासिल नहीं किया जा सकता. आर्थिक आंकड़ों को लेकर पारदर्शिता जरूरी है, क्योंकि इन्हीं के आधार पर सरकार की नीतियां, निवेश के फैसले और विकास की दिशा तय होती है.
चर्चा में यह भी सामने आया कि जीडीपी में वृद्धि का दावा और जमीनी आर्थिक स्थिति के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है. बेरोजगारी, घटती आमदनी, कमजोर मांग, छोटे कारोबारों की मुश्किलें और असमानता जैसे सवाल लगातार बने हुए हैं. यदि आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक नहीं पहुंच रहा है, तो केवल ऊंची वृद्धि दर को विकास का प्रमाण नहीं माना जा सकता.
निधीश त्यागी ने इस सवाल को रेखांकित किया कि यदि वृद्धि दर वास्तव में 7.8 प्रतिशत है, तो सरकारी स्कूलों, मनरेगा, रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति में सुधार क्यों नहीं दिखता. यही अंतर सरकारी आंकड़ों और नागरिकों के अनुभव के बीच अविश्वास पैदा करता है. इसलिए बहस केवल 7.8 प्रतिशत और 2.6 प्रतिशत के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि आर्थिक विकास का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है.
पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

