श्रवण गर्ग | ये सरकार सच का सामना करने से डर रही है

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग चर्चा कर रहे हैं संसद के मानसून सत्र के उस अंत की, जिसमें सरकार और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी मांगों के साथ खड़े रहे, लेकिन संसद में सार्थक कामकाज नहीं हो सका. अब संसद का सत्र खत्म हो चुका है और देश की नजर 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन पर है. सवाल यह है कि मोदी इस बार देश से क्या कहेंगे?

श्रवण गर्ग इस पूरे घटनाक्रम को एक ऐसे राजनीतिक "सीरियल" की तरह देखते हैं, जिसका पहला हिस्सा संसद के भीतर खत्म हुआ, लेकिन जिसकी कहानी 15 अगस्त को लाल किले से आगे बढ़ेगी. उनके मुताबिक, संसद के अंतिम दिन गृह मंत्री अमित शाह सदन में आए जरूर, लेकिन जिस बयान की विपक्ष मांग कर रहा था, वह नहीं आया. कुछ ही मिनटों में वंदे मातरम के साथ सदन की कार्यवाही समाप्त हो गई. ऐसे में सवाल यह है कि अगर अमित शाह संसद में अपना पक्ष नहीं रख पाए, तो अब प्रधानमंत्री के पास क्या विकल्प बचा है?

श्रवण गर्ग के मुताबिक, प्रधानमंत्री के सामने सबसे बड़ी दुविधा यही है कि वे 20 जुलाई के बाद छात्रों और आंदोलन से जुड़े मुद्दे पर सोशल मीडिया के जरिए जिस मेल-मिलाप की भाषा बोलते रहे हैं, उसे 15 अगस्त के भाषण में आगे बढ़ाएं या फिर गृह मंत्रालय और सरकार के रुख का बचाव करें. अगर प्रधानमंत्री अमित शाह के रुख को दोहराते हैं तो इसका संदेश सरकार और गृह मंत्रालय के बचाव के तौर पर जाएगा. लेकिन अगर वे उससे दूरी बनाते हैं, तो सरकार के भीतर उसकी अपनी राजनीतिक कीमत हो सकती है.

यही वह जगह है जहां श्रवण गर्ग प्रधानमंत्री के लिए सबसे बड़ा संकट देखते हैं. छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई, पैलेट गन के इस्तेमाल और गिरफ्तारियों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है. वहीं सरकार के कई मंत्री इन आरोपों को खारिज कर चुके हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री के सामने यह सवाल भी रहेगा कि वे अपने मंत्रियों के बयानों का समर्थन करेंगे या उनसे अलग कोई नई लाइन रखेंगे.

लेकिन 15 अगस्त का भाषण केवल मौजूदा विवादों तक सीमित नहीं होगा. श्रवण गर्ग पिछले साल के लाल किले के भाषण को भी कसौटी मानते हैं. पिछले वर्ष प्रधानमंत्री ने 2047 के भारत का रोडमैप, ऑपरेशन सिंदूर, राष्ट्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भर भारत, आर्थिक सुधार और रोजगार जैसे मुद्दों पर बड़े ऐलान किए थे. अब सवाल यह है कि एक साल बाद उन घोषणाओं का कितना हिस्सा जमीन पर दिखाई देता है.

श्रवण गर्ग का सुझाव है कि इस बार प्रधानमंत्री के भाषण को केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि पिछले साल किए गए वादों की स्थिति से जोड़कर देखना चाहिए. क्या नई घोषणाओं से पहले पुरानी घोषणाओं का हिसाब दिया जाएगा? क्या प्रधानमंत्री देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों पर बात करेंगे या फिर एक बार फिर राजनीतिक विवादों को अपने इर्द-गिर्द केंद्रित कर देंगे?

और अंत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 15 अगस्त को लाल किले पर खड़े नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में देश से बात करेंगे या अपनी सरकार के संकट का जवाब देंगे? यही भाषण इस समय सबसे ज्यादा इंतजार और राजनीतिक जिज्ञासा का विषय बना हुआ है.

पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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