आकार पटेल | सिर्फ लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहना महानता का प्रमाण नहीं
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल और निधीश त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल, उनकी राजनीतिक विरासत, जवाहरलाल नेहरू के योगदान और भारत की वर्तमान दिशा पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत राम माधव के उस लेख से हुई जिसमें मोदी के लंबे सार्वजनिक जीवन और प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को उनकी ऐतिहासिक सफलता का प्रमाण बताया गया था. इसी दावे के आधार पर दोनों वक्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि किसी नेता की विरासत को आखिर किस पैमाने पर मापा जाना चाहिए.
आकार पटेल ने कहा कि किसी भी राजनीतिक नेता की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह कितने वर्षों तक सत्ता में रहा. उनके अनुसार असली प्रश्न यह है कि उसने अपने पीछे कैसी संस्थाएं, कौन से मूल्य और किस तरह की सामाजिक विरासत छोड़ी. उन्होंने तर्क दिया कि दुनिया भर में बड़े नेताओं को इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने ऐसे ढांचे तैयार किए जो उनके जाने के बाद भी समाज और देश को दिशा देते रहे.
चर्चा के दौरान जवाहरलाल नेहरू की विरासत का विशेष उल्लेख हुआ. आकार पटेल ने कहा कि आजादी के बाद भारत जिन संस्थाओं पर खड़ा हुआ, उनमें से बड़ी संख्या नेहरू काल में स्थापित हुई. उच्च शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, औद्योगिक विकास और सांस्कृतिक संस्थानों के निर्माण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इन संस्थाओं का प्रभाव आज भी दिखाई देता है. उनके अनुसार नेहरू की आलोचना करने वाले भी इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकते कि उन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण की बुनियाद रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इसके बरअक्स मोदी सरकार की उपलब्धियों पर चर्चा करते हुए सवाल उठाया गया कि क्या पिछले 12 वर्षों में ऐसी संस्थागत विरासत तैयार हुई है जिसे आने वाली पीढ़ियां उसी तरह याद रखेंगी. आकार पटेल ने कहा कि सरकार समर्थक अक्सर आर्थिक विकास, सड़क निर्माण, डिजिटल सेवाओं और वैश्विक मंचों पर भारत की मौजूदगी का उल्लेख करते हैं, लेकिन संस्थागत निर्माण के स्तर पर तस्वीर उतनी स्पष्ट दिखाई नहीं देती.
आर्थिक विकास के दावों पर भी विस्तार से चर्चा हुई. आकार पटेल ने कहा कि भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया भी होती है और केवल सकल घरेलू उत्पाद के आकार में वृद्धि को असाधारण उपलब्धि नहीं माना जा सकता. उन्होंने कहा कि विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि आम नागरिक के जीवन में कितना सुधार आया, रोजगार के अवसर कितने बढ़े और सामाजिक असमानता कितनी कम हुई.
विदेश नीति पर बातचीत के दौरान भारत की वैश्विक भूमिका पर भी सवाल उठाए गए. आकार पटेल ने कहा कि यदि भारत वास्तव में विश्व राजनीति में निर्णायक शक्ति बन रहा है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय संकटों और वैश्विक निर्णयों में दिखाई देना चाहिए. उन्होंने यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन मुद्दों पर भारत की भूमिका को लेकर गंभीर मूल्यांकन की आवश्यकता है.
चर्चा में प्रेस की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जवाबदेही, युवाओं के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था पर बात करते हुए दोनों वक्ताओं ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी मानी जाती रही है. लेकिन यदि शिक्षा, रोजगार और अवसरों से जुड़े सवालों का समाधान नहीं हुआ तो यही ताकत भविष्य में चुनौती भी बन सकती है. परीक्षा प्रणाली को लेकर पैदा हुए विवादों और युवाओं में बढ़ती असुरक्षा की भावना को भी इसी संदर्भ में देखा गया.
आकार पटेल ने कहा कि आधुनिक भारत की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी विविधता रही है. उन्होंने तर्क दिया कि भारत की लोकतांत्रिक सफलता का आधार यह रहा कि अलग-अलग भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों के लोग एक साझा राष्ट्रीय ढांचे के भीतर साथ रह सके. उनके अनुसार भारत के भविष्य पर विचार करते समय इस मूल भावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. पूरी बातचीत यहाँ देख सकते हैं.

